भारतकोश
सुभाषितरत्नभाण्डागार (पण्डित काशीनाथ शर्मा संग्रह)

सुभाषितरत्नभाण्डागार (पण्डित काशीनाथ शर्मा संग्रह)

Subhashita Ratna Bhandagara

पण्डित काशीनाथ शर्मा (सम्पादक: नारायण राम आचार्य) द्वारा

स्रोत: Subhashita Ratna Bhandagara (10,000+ Classic Sanskrit Epigrams & Maxims - Nirnaya Sagar Press) (उद्गम)

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७४ | सुभाषीतरत्नभाण्डागारस्थपद्यानां ---|---|---

शिशिरमासमपा (शिशु ६ ६५) ३४७।१०शुद्धकास्यरचितापि ८५।९शोकोत्पत्तिर २९०।७२
शिशिरसीकर (शा प ३८९७) ३४३।९९शुद्धमाविलमव (कुमार ८ ५७) २९७।१२शोकेन रोगा (वृ चा १० २०) ३९२।६११
शिशुरपि निपुणो १७५।९४२शुद्धा सङ्गं न (शिशु १८ १३) १२९।५९शोणं वीक्ष्य (सा द ३ ३६) ३५८।६३
शिशुर्वेत्ति पशुर्वेत्ति वेत्ति २९।९शुद्धान्ते सीधुपानोन्मद ८।१९६शोणौ कोणौ सखि २८६।९६
शिष्टैरप्यविशेष (द्वि ३ १२८) १४८।२३९शुन पुच्छमिव (वृ चाणक्य ७ १९) ३०।८शोभते विदुषा (दृष्टांत श ५०) ३९।१७
शीकरासार (विदग्ध मुख४ ३८) १९४।२६शुभ वाप्यशुभं (दृष्टांत श ३१) १६८।६८४शोभन्ते विद्यया १५६।१३०
शीघ्रं भूमिगृहे (शा प ३४११) २७६।५२शुभानना (किरात ८ ४२) ३३८।८५शोषं गते (शा प ७८५) २१२।४०
शीघ्रकृत्येषु (पञ्च ३ २१८) ३८५।३२९शुभ्र मङ्ग सवि (भर्तृ १ ९५) ३७७।१४शौर्यं केसरिणा १०८।२०३
शीतमध्वा कदम्बं च (सु ३१६९) ६६।२५शुभ्रभिरे स्मित ३३२।४७श्याम श्रीकुचकुङ्कुम १४।८
शीतलादिव सत्रस्तं (शा प ३८६२)३४०।५शुश्रूषस्व गुरून् (अ शाकु ४ १७)२५१।३७श्यामं च वर्तुलकार १८५।२०
शीतवातातपक्लेशा (सु ३२०७)१६३।४६९शुश्रूषस्व गुरून् (मालती १० २२)३५२।४४श्यामलेनाङ्कितं (रसग उपमा ) २५८।४३
शीतभीताश्च (चाणक्य ९६) ३९२।६२०शुश्रूषामनुरुन्धती ३५१।४१श्यामश्वेतारुणाङ्गा जल १४।४
शीतांशुर्मुख (रत्ना ३ ११) ३०७।६०शुष्कं मास त्रि(चाणक्य ६४) १६२।३९५श्यामा प्रिया (प्रमगा ११) ३९०।५४१
शीतांशुर्बिंब (विद्ध शा ३ १९) २८१।११८शुष्केन्धने वह्नि (वानरा ६) १७३।८७३श्यामा मन्थर १६०।३१०
शीतांशुस्फटिकाल ३०२।१०३शून्यं वासगृह (अमरू ८२) ३११।२८श्यामा मिलिन्दमाला २५७।९
शीताशोरिव नूतनस्य ३४६।२९शून्यं वेश्म चिरा (सूक्ति ८७ ५) ३५५।८४श्यामासङ्ग (ध्वन्या २ १७) २९२।२३
शीतातपादिकष्टानि (पञ्च १ २९३)९७।११शून्यं कुञ्जगृह निरीक्ष्य ३५८।७४श्यामौ तव १९४।२१
शीतार्तिप्रसर (शा प.३९३३) ३४७।५१शून्यमपुत्रस्य गृहं (मृच्छ १ ८) ६६।३२श्रद्दधान शु(भा १२ ६०७१) १६७।६९९
शीतेऽतीते (नीति प्र १४) १७८।१००३शून्यमा (योग वा सार १ ८) १६१।३७०श्रमण श्राव (सूक्ति ८९ १७) ३६४।३५
शीतेनाध्युषितस्य (भोजप्र २३२) ६८।७२शून्येऽपि च (भामिनी प्रा ८५) ४७।८७श्रमयति शरीर २५९।७३
शीधुपानविधु (किरात ९ ४२) ३१५।४२शूरं त्यजामि वैधव्यादुदारं ६२।३श्रवणाञ्जलि (वेणी १ ४) ३६।५७
शीधुपानविधुरेषु (किरात ९ ७३)३१६।६५शूरतव्युत्का मृदु ३८४।३०२श्रावं श्रावं त्वदीय ११२।२८५
शीर्णघ्राणाङ्घ्रिपःणी (सूर्येश ६) २७।१६शूराश्च कृतविद्याश्च (सु ५४२) १५६।१६३श्रियं प्रदुग्धे (विद्ध शा १ ८) ३०।१२
शीलं प्रधानं (भा ५ १।१४२) ३७७।१शूरा केऽपि पुर ७४।३८श्रिया हस (किरात ८ ४४) ३३८।८७
शीलं रक्षतु मेधावी (सु ३०५२) ८४।१२शूरा सन्ति सहस्रश (शशि व ) ५३।२७१श्रियो दोलालोला (प्रब ९६) ३७२।१३३
शीलं शातयति श्रुतं ६८।७९शूरोऽर्थशास्त्र (शा प १३३८) १४३।३४श्रियो वासा (सूक्ति १९ ६) २२४।९५
शीलं शौर्यमना १५८।२५३शूरोऽसि कृतविद्यो (पंच.४ ३९) २२९।१२श्रीकण्ठस्य कपर्द (अनर्घ रा.७ ५३) ९।१३७
शीलभारवती (रसगं दीप ) १५६।१६५शृगालशशशार्दूल २२५।१९९श्रीकण्ठस्य सकृत्ति (सु ९५) ७।९१
शीलानि ते चन्दन ३६२।१२शृणु सखि (कुट्टनी म ३९२) ३६४।३४श्रीकण्ठासक्त ११३।२९२
शीलावलम्बनमह १५६।१५९शृणु हृदयगृहं (शांति श १ २८)३५०।७२श्रीकरपिहित चक्षु १४।७
शीलाविजामाम्ला (शा प १६३) ३३।२७शृण्वन्पुर (भामिनी प्रा ३५) २१२।४१श्रीकर्ण प्रौढतेजा १९४।१०
शुक तव पठन (शा.प ८७४) २२७।१८४शेते शीतकरोऽम्बुजे ३३०।१श्रीकृष्ण पूतनाया १००।६
शुकतुण्डच्छवि सवितु (शा प ८६) २७।२शेषं भाष्यं तु काव्येन ६६।३०श्रीकृष्ण त्वत्प्रतापेन १९४।१९
शुक हरितयवाना (शा प ३९२०)३४६।२४शैल्यं नाम (अल कौस्तु नि १) २४५।१४श्रीधात्रि दुग्धो १४।१४
शुकीचञ्चूत्वात्तच्छवि २६५।२९०शैलराजतनयास्तन (सु ७१) १३।१श्रीनाथ न श्रुतमिति १८१।२७
शुक्तिद्वयपुटे भोज (भोज २५६) ११७।८२शैलषी तव १३७।६८श्रीनाथस्तवनानु ३८।२६
शुक्ले पक्षे शीत १७२।८१६शैलेन्द्र प्रतिपाय (सा द १०.९२) ६।७६श्रीपरिचयाजडा (रविगुप्त ) ६२।१३
शुचा पात्रं (शांति श १ २५) ३७६।२४९शैलेयेषु शिलात २१३।५९श्रीभोज (शा प १२५३) ११७।८४
शुचित्वं त्यागिता (काम नी ४ ७५) ८८।३शैले शैले न (चाणक्य.२ ९) १५७।१८४श्रीमच्चन्दनवृक्ष (भोजप्र.२२) २३८।५९
शुचि भूमिगतं (शा.प ६११) १५६।१४३शैवालश्रेणिशोभा ९।१३२श्रीमन्ता कथय २४६।३०
शुचि भूषयति (किरात २ ३२) ३९२।६१४शैशवात्प्रभृति ३६२।११श्रीमद्गोपवधूश्वर्यं २४१।६२
शुचिरिति परित (शा प ३५९३)२९४।४६शोक मा कुरु ७५।४श्रीमद्राजशिखामणे १३६।४६
शुण्ठीगोक्षुरयो (धर्म विवेक ६) १८३।५७शोकस्थानसह (भा १२ ७५१)१६२।४३१श्रीमद्रूपमणे गुणेन १२२।१७७
शुद्ध स एव कुलजश्च (सु.२७३) ५०।२११शोकारातिभयत्रा (भोजप्र १४८) ८८।१४श्रीमद्धीर मही ११२।२७७