सुभाषितरत्नभाण्डागार (पण्डित काशीनाथ शर्मा संग्रह)

सुभाषितरत्नभाण्डागार (पण्डित काशीनाथ शर्मा संग्रह)
Subhashita Ratna Bhandagara
पण्डित काशीनाथ शर्मा (सम्पादक: नारायण राम आचार्य) द्वारा
स्रोत: Subhashita Ratna Bhandagara (10,000+ Classic Sanskrit Epigrams & Maxims - Nirnaya Sagar Press) (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished516 पृष्ठ
पृष्ठ 505, कुल 516 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 505
७४ | सुभाषीतरत्नभाण्डागारस्थपद्यानां ---|---|---
| शिशिरमासमपा (शिशु ६ ६५) ३४७।१० | शुद्धकास्यरचितापि ८५।९ | शोकोत्पत्तिर २९०।७२ |
| शिशिरसीकर (शा प ३८९७) ३४३।९९ | शुद्धमाविलमव (कुमार ८ ५७) २९७।१२ | शोकेन रोगा (वृ चा १० २०) ३९२।६११ |
| शिशुरपि निपुणो १७५।९४२ | शुद्धा सङ्गं न (शिशु १८ १३) १२९।५९ | शोणं वीक्ष्य (सा द ३ ३६) ३५८।६३ |
| शिशुर्वेत्ति पशुर्वेत्ति वेत्ति २९।९ | शुद्धान्ते सीधुपानोन्मद ८।१९६ | शोणौ कोणौ सखि २८६।९६ |
| शिष्टैरप्यविशेष (द्वि ३ १२८) १४८।२३९ | शुन पुच्छमिव (वृ चाणक्य ७ १९) ३०।८ | शोभते विदुषा (दृष्टांत श ५०) ३९।१७ |
| शीकरासार (विदग्ध मुख४ ३८) १९४।२६ | शुभ वाप्यशुभं (दृष्टांत श ३१) १६८।६८४ | शोभन्ते विद्यया १५६।१३० |
| शीघ्रं भूमिगृहे (शा प ३४११) २७६।५२ | शुभानना (किरात ८ ४२) ३३८।८५ | शोषं गते (शा प ७८५) २१२।४० |
| शीघ्रकृत्येषु (पञ्च ३ २१८) ३८५।३२९ | शुभ्र मङ्ग सवि (भर्तृ १ ९५) ३७७।१४ | शौर्यं केसरिणा १०८।२०३ |
| शीतमध्वा कदम्बं च (सु ३१६९) ६६।२५ | शुभ्रभिरे स्मित ३३२।४७ | श्याम श्रीकुचकुङ्कुम १४।८ |
| शीतलादिव सत्रस्तं (शा प ३८६२)३४०।५ | शुश्रूषस्व गुरून् (अ शाकु ४ १७)२५१।३७ | श्यामं च वर्तुलकार १८५।२० |
| शीतवातातपक्लेशा (सु ३२०७)१६३।४६९ | शुश्रूषस्व गुरून् (मालती १० २२)३५२।४४ | श्यामलेनाङ्कितं (रसग उपमा ) २५८।४३ |
| शीतभीताश्च (चाणक्य ९६) ३९२।६२० | शुश्रूषामनुरुन्धती ३५१।४१ | श्यामश्वेतारुणाङ्गा जल १४।४ |
| शीतांशुर्मुख (रत्ना ३ ११) ३०७।६० | शुष्कं मास त्रि(चाणक्य ६४) १६२।३९५ | श्यामा प्रिया (प्रमगा ११) ३९०।५४१ |
| शीतांशुर्बिंब (विद्ध शा ३ १९) २८१।११८ | शुष्केन्धने वह्नि (वानरा ६) १७३।८७३ | श्यामा मन्थर १६०।३१० |
| शीतांशुस्फटिकाल ३०२।१०३ | शून्यं वासगृह (अमरू ८२) ३११।२८ | श्यामा मिलिन्दमाला २५७।९ |
| शीताशोरिव नूतनस्य ३४६।२९ | शून्यं वेश्म चिरा (सूक्ति ८७ ५) ३५५।८४ | श्यामासङ्ग (ध्वन्या २ १७) २९२।२३ |
| शीतातपादिकष्टानि (पञ्च १ २९३)९७।११ | शून्यं कुञ्जगृह निरीक्ष्य ३५८।७४ | श्यामौ तव १९४।२१ |
| शीतार्तिप्रसर (शा प.३९३३) ३४७।५१ | शून्यमपुत्रस्य गृहं (मृच्छ १ ८) ६६।३२ | श्रद्दधान शु(भा १२ ६०७१) १६७।६९९ |
| शीतेऽतीते (नीति प्र १४) १७८।१००३ | शून्यमा (योग वा सार १ ८) १६१।३७० | श्रमण श्राव (सूक्ति ८९ १७) ३६४।३५ |
| शीतेनाध्युषितस्य (भोजप्र २३२) ६८।७२ | शून्येऽपि च (भामिनी प्रा ८५) ४७।८७ | श्रमयति शरीर २५९।७३ |
| शीधुपानविधु (किरात ९ ४२) ३१५।४२ | शूरं त्यजामि वैधव्यादुदारं ६२।३ | श्रवणाञ्जलि (वेणी १ ४) ३६।५७ |
| शीधुपानविधुरेषु (किरात ९ ७३)३१६।६५ | शूरतव्युत्का मृदु ३८४।३०२ | श्रावं श्रावं त्वदीय ११२।२८५ |
| शीर्णघ्राणाङ्घ्रिपःणी (सूर्येश ६) २७।१६ | शूराश्च कृतविद्याश्च (सु ५४२) १५६।१६३ | श्रियं प्रदुग्धे (विद्ध शा १ ८) ३०।१२ |
| शीलं प्रधानं (भा ५ १।१४२) ३७७।१ | शूरा केऽपि पुर ७४।३८ | श्रिया हस (किरात ८ ४४) ३३८।८७ |
| शीलं रक्षतु मेधावी (सु ३०५२) ८४।१२ | शूरा सन्ति सहस्रश (शशि व ) ५३।२७१ | श्रियो दोलालोला (प्रब ९६) ३७२।१३३ |
| शीलं शातयति श्रुतं ६८।७९ | शूरोऽर्थशास्त्र (शा प १३३८) १४३।३४ | श्रियो वासा (सूक्ति १९ ६) २२४।९५ |
| शीलं शौर्यमना १५८।२५३ | शूरोऽसि कृतविद्यो (पंच.४ ३९) २२९।१२ | श्रीकण्ठस्य कपर्द (अनर्घ रा.७ ५३) ९।१३७ |
| शीलभारवती (रसगं दीप ) १५६।१६५ | शृगालशशशार्दूल २२५।१९९ | श्रीकण्ठस्य सकृत्ति (सु ९५) ७।९१ |
| शीलानि ते चन्दन ३६२।१२ | शृणु सखि (कुट्टनी म ३९२) ३६४।३४ | श्रीकण्ठासक्त ११३।२९२ |
| शीलावलम्बनमह १५६।१५९ | शृणु हृदयगृहं (शांति श १ २८)३५०।७२ | श्रीकरपिहित चक्षु १४।७ |
| शीलाविजामाम्ला (शा प १६३) ३३।२७ | शृण्वन्पुर (भामिनी प्रा ३५) २१२।४१ | श्रीकर्ण प्रौढतेजा १९४।१० |
| शुक तव पठन (शा.प ८७४) २२७।१८४ | शेते शीतकरोऽम्बुजे ३३०।१ | श्रीकृष्ण पूतनाया १००।६ |
| शुकतुण्डच्छवि सवितु (शा प ८६) २७।२ | शेषं भाष्यं तु काव्येन ६६।३० | श्रीकृष्ण त्वत्प्रतापेन १९४।१९ |
| शुक हरितयवाना (शा प ३९२०)३४६।२४ | शैल्यं नाम (अल कौस्तु नि १) २४५।१४ | श्रीधात्रि दुग्धो १४।१४ |
| शुकीचञ्चूत्वात्तच्छवि २६५।२९० | शैलराजतनयास्तन (सु ७१) १३।१ | श्रीनाथ न श्रुतमिति १८१।२७ |
| शुक्तिद्वयपुटे भोज (भोज २५६) ११७।८२ | शैलषी तव १३७।६८ | श्रीनाथस्तवनानु ३८।२६ |
| शुक्ले पक्षे शीत १७२।८१६ | शैलेन्द्र प्रतिपाय (सा द १०.९२) ६।७६ | श्रीपरिचयाजडा (रविगुप्त ) ६२।१३ |
| शुचा पात्रं (शांति श १ २५) ३७६।२४९ | शैलेयेषु शिलात २१३।५९ | श्रीभोज (शा प १२५३) ११७।८४ |
| शुचित्वं त्यागिता (काम नी ४ ७५) ८८।३ | शैले शैले न (चाणक्य.२ ९) १५७।१८४ | श्रीमच्चन्दनवृक्ष (भोजप्र.२२) २३८।५९ |
| शुचि भूमिगतं (शा.प ६११) १५६।१४३ | शैवालश्रेणिशोभा ९।१३२ | श्रीमन्ता कथय २४६।३० |
| शुचि भूषयति (किरात २ ३२) ३९२।६१४ | शैशवात्प्रभृति ३६२।११ | श्रीमद्गोपवधूश्वर्यं २४१।६२ |
| शुचिरिति परित (शा प ३५९३)२९४।४६ | शोक मा कुरु ७५।४ | श्रीमद्राजशिखामणे १३६।४६ |
| शुण्ठीगोक्षुरयो (धर्म विवेक ६) १८३।५७ | शोकस्थानसह (भा १२ ७५१)१६२।४३१ | श्रीमद्रूपमणे गुणेन १२२।१७७ |
| शुद्ध स एव कुलजश्च (सु.२७३) ५०।२११ | शोकारातिभयत्रा (भोजप्र १४८) ८८।१४ | श्रीमद्धीर मही ११२।२७७ |