सुभाषितरत्नभाण्डागार (पण्डित काशीनाथ शर्मा संग्रह)

सुभाषितरत्नभाण्डागार (पण्डित काशीनाथ शर्मा संग्रह)
Subhashita Ratna Bhandagara
पण्डित काशीनाथ शर्मा (सम्पादक: नारायण राम आचार्य) द्वारा
स्रोत: Subhashita Ratna Bhandagara (10,000+ Classic Sanskrit Epigrams & Maxims - Nirnaya Sagar Press) (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished516 पृष्ठ
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| सुभाषितरत्नभाण्डागारस्थपद्यानां | ||
|---|---|---|
| ८० |
| साहारं वचन ३१०।९ | सुखं दु खान्तं (मा १२ ८३०) ३८२।२१९ | सुभगे कोटिसख्यत्व ३३१।७ |
| साहित्यपाथो (कुव ७३) ३८।१८ | सुख हि (मृच्छ १ १०) १७५।९१८ | सुभाषितं हारि विश २९।१७ |
| साहित्यसङ्गीत (भर्तृ स ७९६) ४०।३० | सुख ह्यवमत (मनु २ १६३) ३९१।५६२ | सुभाषितज्ञेन जनेन १७३।८६७ |
| साहित्ये सुकुमार (सूक्ति ४ १०४) ३४।५९ | सुखदु खा(मा १२ १२५१८) ३८२।२१० | सुभाषितमयैर्द्रव्यै (पच २ १७४) २९।३ |
| सिंह शिशु (भर्तृ स ७५) ७९।१४ | सुखदु खे (दृ ग ४७) ३८२।२१३ | सुभाषितरमा (शा प १५६) १५९।२९४ |
| सिंहक्षुण्णकरीन्द्रा (नीतिप्र ८) ८६।१४ | सुखदु खे हि (वृ चा ४ २३) ३८२।२१६ | सुभाषितरसास्वाद (पच २ १७३) २९।५ |
| सिंहादेकं (चाणक्य ६६) १६२।३९७ | सुखमापतितं(मा ३ १५३८४) ३८२।२२२ | सुभाषितस्याध्ययने २२७।१८६ |
| सिंहो बली गिरि (भर्तृ म ७०७) ९२।८० | सुखमेव हि (मा १२ ७५५) ३८२।२०४ | सुभाषितेन गीतेन २९।२ |
| सिंहो व्याकरण (पच २ ३६) १७९।१०२५ | सुखयतिितरा न ८५।१० | सुभाषिते प्रीतिरनु (सु २६९) ५०।१८७ |
| सिक्त स्फटिककुम्भा (कुव १७१) १३४।५ | सुखलवदशा हर्ष ५१।२२८ | सुभिन्नं (चाणक्य ९०) १६२।४१७ |
| सिक्ताया वीर (शा प १२३४) १२४।१५ | सुखशय्या ताम्बूल(शा प ३७८१) ३५२।६ | सुभ्रु त्वं कुपिते (चोरपचाशिका) ३०७।६५ |
| सिक्तानैर्मञ्जरीति ११४।२५ | सुखस्य दु खस्य न ९२।५७ | सुभ्रु त्व नवनीतकल्प ३०७।७० |
| सित वसनम (शा प ३०९७) ३५६।२७ | सुखाद्बहुनर (मा १२ ७४६५) ३८६।३७९ | सुभ्रुवामधिपयो(शिशु १० ८७) ३२१।१३ |
| सितकिरणकपोली ३०३।१२६ | सुखार्थी त्यजते १५८।२१६ | सुम ये वाग्भङ्गैर्वचन २९२।१७ |
| सितांशुवर्णैर्वियति १०५।१२६ | सुखार्थी ना (राजन ३ २१५) ३८२।२०७ | सुमनोवररत्नाना १४५।१०८ |
| सिद्ध मन्त्रौ (वृ चा १४ १७) १६८।६५६ | सुग्वास्वादपरो (हि ४ ७७) ३७८।५० | सुमन्त्रिते सुवि (शा प १४३१) १५३।९ |
| सिद्धिं वाञ्छ (पव ३ २२४) १७९।१०२७ | सुगन्ध कतकीपुष्प १४६।१७६ | सुमहन्त्यपि (हि १ २६) १६३।४४० |
| सिद्ध्यन्ति कर्मसु(अ शाकु ७ ४) १५२।४०६ | सुगृहीतमालिन (कवित्तामृत १४) ५७।१४५ | सुमुखेन वदन्ति (पच २ १९९) ३४९।६० |
| सिन्दूरं रवि ३२०।४५ | सुजन व्यजनं (प्रमगा ३) ४५।१८ | सुमुखोऽपि सुवृत्तो (शाम ३५८) २४८।७८ |
| सिन्दूर सीमन्ता(शा प १२४०) १३९।३ | सुजनानामपि हृदयं ५६।१२२ | सुमेरुशिखरप्रान्त १८१।१३ |
| सिन्दूरद्युतिमुग्ध (नैषध १२ ३६) १२३।२ | सुजनो न याति (भर्तृ २ ६२) ४७।११० | सुरतमरखिन्नपद्म(विद्ध शा १ २८) ३२५।३ |
| सिन्दूरस्पृहया (नल च ३ ७) २७।९ | सुजीर्णमन्नं (वानर्यष्टक ७) १७४।९०६ | सुरतविरत (शा प ३७०७) ३२१।१८ |
| सिन्दूराणीव २८।१९ | सुतं पतन्त प्रस (भोजप्र २९२) १८२।३६ | सुरते च समाप्ते च ३१७।१ |
| सिन्धुष्वङ्गावगाह १९।३९ | सुतनु जहिहि (अमरु ३९) ३११।१३ | सुरमन्दिरतरुमूल (मोहमुद्गर) ३६७।२६ |
| सिन्धूत्तरं (शा प १११३) २१७।५३ | सुतनु जहिहि (शा प.३५७७) ३०६।३० | सुराणा (अल कोस्तु व्य १) १०६।१५८ |
| सिन्धो सुधांशुश २९७।२५ | सुतनु श्रुतिसेवनतो ३२१।२ | सुरासुरशिरोरत्नकान्ति (सु ६) १९।४१ |
| सिन्धोजैत्रमय ११०।२३८ | सुतनु हृदया (अ शाकु ७ २४) ३०६।४८ | सुरूपं पुरुष दृष्ट्वा ३४९।४० |
| सीतासमागमोत्कण्ठा १८९।९ | सुतन्प्रत्य (शा प १४१९) १५०।३४७ | सुलभ वस्तु सर्वस्य (दृ श ५७) १५७।१७२ |
| सीत्कार शिक्षयति (शा प ५२४) १८६।३ | सुदीर्घा रागशा(शा प ३३३५) २६४।२८४ | सुलभा (मा ५ १३४८) १४५।११५ |
| सीत्कृतानि (शिशु १० ७५) ३१९।१८ | सुधाशोजर्जितं क्व (पच म २०) ९३।९० | सुवदनावदना ३३२।४३ |
| सीदन्ति चामि ९८।२ | सुधाकरकर (शा प ११०२) २१८।६७ | सुवर्णतुषणा (मा ५ १२५५) १४८।२५४ |
| सीदन्ति सन्तो ९९।१० | सुधावान्त कान्ति २६।२०० | सुवर्णवर्णललितापद १०१।४ |
| सीमन्तिनीषु का १९६।३ | सुधाबद्धग्रासै (विद्ध १ ३१) २६३।१९८ | सुवर्णस्य सुवर्णस्य १८६।८ |
| सीमा वृद्धि (पच १ १०१) १४४।९४ | सुधामयोऽपि (शा प ३३०५) २६०।१२० | सुवर्णालंकृता कन्या १८७।२१ |
| सीमा सङ्कोच (पच १ १०२) १४४।९५ | सुधारश्मि सद्यस्तिमिर ३०१।८३ | सुवर्णे पद्मे (भोजप्र १२६) १४७।२०० |
| सुकपरिविन्द २००।४९ | सुधाशुभ्र (भर्तृ १ ४०) ३७८।५२ | सुविरलमोक्ति (रमंग २ रूप) २६२।१७३ |
| सुकविद्वितय मन्ये (भोजप्र १९१) ३६।३१ | सुदारी सा (शा प ३३६६) २७०।४३१ | सुवृत्तस्यैकरूपस्य पर (सु २१९) ४६।७१ |
| सुकर सर्वथा (रा ४ ३२ ७) ३८२।२२५ | सुपर्णपरिसवितस्तदनु १०१।५ | सुव्यवमायिनि शूरे ६२।१८ |
| सुकवे शब्द (भोजप्र ८०) ३२।३ | सुपर्णे खर्णाङ्गारचित २३१।३९ | सुशील खर्णगौराङ्ग १९६।८ |
| सुकुमारमहो (शिशु १६ २१) ५९।१९९ | सुपात्रदानाच्च भवेद्ध १७३।८४९ | सुश्यामा चन्दनवती १९५।३ |
| सुकुलजन्म १७५।९३८ | सुपूरा स्यात्कृ (पच १ २६) १८४।५०१ | सुषमाविषये परी २६२।१७६ |
| सुकुले योजये (चाणक्य ३ ३) १६०।३४१ | सुभग वदति जनम्त ३५२।१२ | सुसदिग्धस्य भक्तस्य १६८।६५४ |
| सुख च दुख (मा ५ १३०६) ८६।३८१ | सुभग तवाननपङ्क १९४।२७ | सुसङ्गत्तैर्जिविनवन्सु (सु १८९) ७२।५२ |
| सुखं जीवन्ति (काव्या.२ ३४१) ८०।२३ | सुभग त्वत्कथारम्भे २८७।१ | सुसहदैर्दैवदपि (शिशु १७ १९) १२७।८ |
| सुभगसलिलाव (अ शाकु १ ३) ३८५।४ |