सुभाषितरत्नभाण्डागार (पण्डित काशीनाथ शर्मा संग्रह)

सुभाषितरत्नभाण्डागार (पण्डित काशीनाथ शर्मा संग्रह)
Subhashita Ratna Bhandagara
पण्डित काशीनाथ शर्मा (सम्पादक: नारायण राम आचार्य) द्वारा
स्रोत: Subhashita Ratna Bhandagara (10,000+ Classic Sanskrit Epigrams & Maxims - Nirnaya Sagar Press) (उद्गम)
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८२ सुभाषितरत्नभाण्डागारस्थपद्यानां
| स्थानान्निर्गत्य (सु १३७९) २९२।३६ | स्पृष्ट्वा येन शिरोरुहे ३६६।१० | स्मेरराजीवनयने (सा द १० ७) ३०८।३ |
| स्थानेषु शिष्य (अनर्घ २ ९) १७६।५५३ | स्पृष्टोल्लसत्किरण २५५।५३ | स्मेरा सन्तु सभा २३१।५२ |
| स्थाने स्थाने (सूक्ति ५९ १४) ३२३।८९ | स्पृहणीया कस्य न (सु ९४६) ४८।१४४ | स्मेरा दिश कुमुद २१०।३० |
| स्थायिनोऽर्थे (शिशु २ ८७) १४७।१८९ | स्पृहयति भुजयो (भर्तृ म ३४६) ७८।५ | स्मेराननेन हरिणा सस्पृह १६।५ |
| स्थाल्यां (भर्तृ स ३४३) ९५।१२७ | स्फटिकमरकतश्रीहा (शा प ११०) १४।६ | स्यादत्यन्तानिरक्षर १८०।१०४४ |
| स्थिति नो रे (भामिनी प्रा ५०) २३०।३५ | स्फटिकस्य गुणे (सु ८९४) २१८।६८ | स्यादेव तोयममृत १४०।५ |
| स्थितिर्गेहोपान्ते ३५३।३६ | स्फारेण सौरभभरेण (सु १८९) ३३।४२ | स्रंसमानमुपयन्त (शिशु १० ४६) ३१६।५ |
| स्थितो न खादामि १७४।८९१ | स्फीतं शीतं (शा प ३८३०) ३३६।३२ | स्रग्दाम मूर्धनि (शा प ११९२) २४७।५३ |
| स्थित्यतिक्रान्ति (किरात ११.५४) ७९।८ | स्फुट स्फुटपलाश ३४५।४३ | स्रस्ता नित (कुमार ३ ५५) २६८।३८१ |
| स्थित्वा क्षणं (शा प ८००) २२१।१७ | स्फुटतरमटवीना १३२।१५ | स्रक्कपोलेन प्रकटीकृतं ५७।१४६ |
| स्थित्वा वैर्या (शा प ५७१) २०८।२४ | स्फुटतु हृदयं (अमरू ७३) ३५७।५१ | स्रक्कान्तदवकान्तारो १३१।३ |
| स्थिरत्वमचिरद्युतौ २५६।३८ | स्फुटमसद्ववमम (कुव १७१) २६६।३२० | स्वकीयं हृदयं (कुव १२०) २६५।२६४ |
| स्थिरापाय (शांति श २ ११) ३७६।२५१ | स्फुटमिदमभि (शिशु ७ ५८) ३३४।१२२ | स्वकेलिलेशस्मित (नैषध १.२३) २५२।४ |
| स्थिरा शैली गुण (कुव ५१) ३८।११ | स्फुटमिवोज्वल (शिशु ५ ६) ३३२।६० | स्वगर्भशुक्तिनिर्मिचं सुवृत्त ८।१३ |
| स्थूलप्रावरणे (शांति श २ २७) ९६।१७ | स्फुरद्बृहतह (का प्र १० ५६१) १०४।८९ | स्वगुणानिव परदोषान्(सु ८१०)५८।१८४ |
| स्नातं खर्गतराङ्गिणी ७।८४ | स्फुरदधीरत्तडिञ्ज (शिशु ६.२५)३४१।३१ | स्वचित्तपरिचिन्त (भर्तृ म ८१२) ७०।३९ |
| स्नातस्त्वाद्विपुरुत्पथासि ११६।५३ | स्फुरदुरसिजभार २९८।१२ | स्वच्छन्द (सु ६५७) २३३।११७ |
| स्नाता प्रावृषि (शा प १२८०) १३२।३३ | स्फुरदनुनिस्वन (नैषध १ ९) १०५।१२४ | स्वच्छन्दं दलदर २४४।२२५ |
| स्नाता तिष्ठति (भोज प्र ३०२) २८१।१९५ | स्फुरद्रोमोद्भेदस्तर ३१८।१२ | स्वच्छन्दवनज तेन(हि.१ ६८)१६५।५५० |
| स्नातुं वाञ्छसि किं १२७।७४ | स्फुरन्त पिङ्गला (सु १७२१) ३४०।६ | स्वच्छन्दैकस्तनश्रीरु १११।६७ |
| स्नान वारिवारि ३५९।१०३ | स्फुरन्नानारत्नारुणित २५४।३२ | स्वच्छन्दोच्छलद (का प्र १४) ९।१३१ |
| स्नानं नाम (शा प १४१५) १४४।१०३ | स्फुरसि बाहुलते (सु १५७३) ३०८।४ | स्वजन स्वात्म (वृ श ७६) १६९।७०७ |
| स्नानाम्भो बहु(शा प ३७५१) ३५१।३९ | स्फुरिते जठरे (शा प ५०७) १८१।१८ | स्वजातीयं विना (वृ श ११) १५०।३५६ |
| स्नानार्द्रमुक्तेष्वनु (रघु १६ ५०) २५७।११ | स्फूर्जद्ब्रह्माण्डशुक्तौ १३८।९१ | स्वजातीयविघाताय(वृ श ९२)१६९।७१३ |
| स्नान्तीना ब्रूह (शिशु ८.५२) ३३९।११० | स्यमानमयाय (शा प ३३१७) २६३।२०८ | स्वत प्रकाशो १०४।१०० |
| स्निग्धं यद्यपि वीक्षितं ३०७।६१ | स्मरकलपद्रुमो बाले २५८।५४ | स्वेदशोजनयन्ति (नैषध २ ६१) २५९।९० |
| स्निग्धमपाल सुरूक्षमेव २९।१९ | स्परतोरभिलाषकल्पिता २७३।१ | स्वेदशजं कुला (हि ३ १६) १४२।२५ |
| स्निग्धस्मेरविलोले २७२।५८ | स्मरदवथुनिमित्तं (द रू २ ४०) २८९।४६ | स्वेदशजातस्य नरस्य १७३।८५२ |
| स्निग्धच्छाया फलिनो २४०।१२९ | स्पर नृशंसतमस्त्व २८२।१३० | स्वपक्षच्छेदं वा समु (सु ४५०) ६०।२५२ |
| स्निग्धेन्दोपलसुन्दर २७२।५९ | स्मरमानसिक्त २६६।३१५ | स्वपरप्रतारकोऽसौ (भर्तृ स १२०) २५१।२७ |
| स्निग्धे यत्परु (शा प ३५४८) ३०८।१८ | स्मरशरधिनि (विद्ध शा २.१०) ३४६।३७ | स्वप्रासादितदर्शनाम २५५।८९ |
| स्नेह स्वीकुरु कृष्ण २८३।१६४ | स्मरशरशतावि (सा द १० ६५) २८८।२४ | स्वप्ने दृष्टा किमपि २७९।६७ |
| स्नेहच्छेदेऽपि (हि १.४६) ४५।२५ | स्मरहुताशनमुर्मुख (शिशु ६.६) ३३२।६१ | स्वप्नेऽपि क्षितिपाव १३३।३९ |
| स्नेहनिर्भरमधत्त (शिशु १० ४९) ३१६।९ | स्मर्तव्या वय (शा प ३३९२) ३५५।८५ | स्वप्नेऽपि देवि रमसे २९१।१० |
| स्नेहसंवर्धिताम्बाला २५८।३० | स्मर्तव्योऽह त्वया (सु १०४४) २९१।२ | स्वप्नेऽपि समरेषु (अल कोस्तु ) १०२।३७ |
| स्नेहेन भूतिदानेन (शा.प ३७१) ५४।२० | स्मार धनुर्यद्विधुनो २५९।६९ | स्वप्रज्ञया कुञ्जिकयेव (सु १९३) ३३।३६ |
| स्नेहोपपन्न इति पूर्णे ६९।१० | स्मारस्मेरमदोन्नम ३७०।८२ | स्वफलनिचय (सु २८३) १७७।९९६ |
| स्नेहो हि वरम (भोज प्र १३७) १७१।७८९ | स्मितं किंचिद्वके (भर्तृ स ९३) २५५।२९ | स्वबालभारस्य तदुत्तमा २५३।६ |
| स्पर्धन्ता सुखमेव २३२।९४ | स्मितज्योत्स्नाग्ना २६३।२०१ | स्वभावं न जहात्ये (वृ श ४०) ४६।५९ |
| स्पर्श स्तनतटस्पर्शो २७७।३६ | स्मितज्योत्स्नाभि (द रू ४ २४) ३१३।६३ | स्वभावं नैव मुञ्चन्ति (वृ श २९) ४६।५७ |
| स्पृष्टास्ते तिग्मरुचौ (हरवि ३) ३३६।३८ | स्मितपुष्पोद्गमोऽय (नागा २ १२) ३१२।३ | स्वभावकठिनस्यास्य (कविता ११) ५४।१६ |
| स्पृशन्नपि गजो (सु २७५०) १५३।२२ | स्मितेन भावेन च (भर्तृ स ७९) २५५।३७ | स्वभावरूर मङ्गजमवि (हि ३ ८७)१४३।६१ |
| स्पृष्टरतवैद्य (रत्ना १.२१) २६४।२३२ | स्मितेनोपायनं (मा द १० ३५) २१५।१ | स्वभावसुन्दर वस्तु (वृ.श.४९) १६८।६९२ |
| स्पृष्टाकृष्टासि पिष्ठे ११७।९४ | स्मेर निवाय (सा द.१०.२४) २७८।२२ | स्वभावारक्तश्रीनखर १२३।८ |