सुभाषितरत्नभाण्डागार (पण्डित काशीनाथ शर्मा संग्रह)

सुभाषितरत्नभाण्डागार (पण्डित काशीनाथ शर्मा संग्रह)
Subhashita Ratna Bhandagara
पण्डित काशीनाथ शर्मा (सम्पादक: नारायण राम आचार्य) द्वारा
स्रोत: Subhashita Ratna Bhandagara (10,000+ Classic Sanskrit Epigrams & Maxims - Nirnaya Sagar Press) (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished516 पृष्ठ
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स्थाननिर्देशानुक्रमकोशः
<div align="right">८३</div>| स्तम्भ १ | स्तम्भ २ | स्तम्भ ३ |
|---|---|---|
| स्वभावेन हि (वृ चा १३ ३) १५५।२७८ | स्वादनेन सुतनो (शिशु १० ७) ३१४।१० | हंसा पद्मवना (शा प १०३८) २४५।१५३ |
| स्वभावेनैव निशित (सु ३८६) ५६।११३ | स्वादित स्वयम (किरात ९ ५५) ३१५।४७ | हंसी वेत्ति परागपिञ्जर २२२।३४ |
| स्वमस्तक समारूढं ३७५।२३४ | स्वाधीना दयिता १७९।१०४० | हंसे शैवलमञ्जरीति ३५४।५९ |
| स्वय कर्म करो (वृ चा ६ ९) १५५।२८३ | स्वाधीनेऽपि (भर्तृ स ८१६) १७०।७५१ | हंसैलैब्धप्रशं (शा प ११२६) २२०।१९ |
| स्वय जहाति सेवक ९७।१३ | स्वाधीनैन समृद्धिज॑नो ४८।१३३ | हंसोऽध्वग श्रममपो ८८।१३ |
| स्वयं तथा न कर्तव्यं स्व ८३।३ | स्वाधीनो रसनाञ्चल. ३८।२८ | हसो न भाति बलिभो १७६।९६४ |
| स्वयं पद्ममुख ३६४।१६ | स्वान्ते वैभबमस्ति ११२।२७५ | हंसो यथा राज (शा प ३६२५) २९९।१२ |
| स्वयं प्रणमते (शिशु २ ५०) ७८।५ | स्वाभाविकं तु (हि १ २०९) ८८।१२ | हंसो विभाति नलिनी १७६।९६३ |
| स्वयंभू शभुर २६४।२५० | स्वाभिप्रायपरोक्षस्य (प्रसगाभ १६) ९७।९ | हंहो दग्धसमीर (शा.प.७९५) २१४।११ |
| स्वयं महेश श्वशुरो ९२।५२ | स्वामिन्प्रभो (सु २०९६) ३१९।२६ | हंहो धीर समीर (सा द.१०.५) २१४।१२ |
| स्वय सरा (किरात १० ६३) १८२।४४ | स्वामिन्मङ्गुरयाल(शृ ति १ ४२) ३२२।३१ | हंहो मीनतनो हरे किमु १७७।११ |
| स्वय स्वमुखविस्तारा ८१।१४ | स्वामिनि गुणा (पञ्च १ २२०) ३८५।३२४ | हंहो वारिनिधे विधे २१७।३८ |
| स्वयमपि भूरिच्छिद्र ५८।१६१ | स्वामी कुप्यति कुप्यता २८७।८ | हठादाकृष्टाना (भोज.प्र २४८) ३८।२४ |
| स्वयमप्राप्त (सु ११०९) २८२।१२३ | स्वामी नि श्वसि (शा प ३६९१) ३५३।४६ | हतं ज्ञानं क्रिया (वृ चा ८ ८) १६६।५७० |
| स्वरसेन बन्नता ५७।१५५ | स्वामी मुग्धतरो (सा द ३ २६६) २३।१५१ | हतमश्रोत्रियं (चाणक्य १००) १६२।४२५ |
| स्वरेण तस्या (कुमार १ ४५) २६३।२१९ | स्वामी सन्भुवनत्रयस्य (सु ५६) २०।६५ | हतेऽभिमन्यौ (शा.प ३९८२) ३६०।५ |
| स्वर्गच्युताना (वृ चा ७ १६) १७३।८५८ | स्वामोदवासित (सु ७३८) २४४।२३० | हत्वा पति नृप (भर्तृ.स ८१८) ३६२।२४ |
| स्वर्गाद्रोपाल कुत्र(भोज प.८५) ११७।९७ | स्वाम्यमाल्यश्च (शा प १४०७) १५०।३१७ | हत्वा लोचनविशिखै २६०।१०२ |
| स्वर्गानर्गलनिर्गल ३८।२९ | स्वाम्यादिष्टस्तु (पञ्च १ १२१) १४४।९६ | हनूमति हुतारा मे १८७।१३ |
| स्वर्गे वास (शिशु १८ ६२) १३०।९२ | स्वाम्यादेशात्तु (पञ्च १ २०) १४४।९७ | हन्त कान्तमपि त २८७।२ |
| स्वर्गे कल्पद्रुमाद्य १३८।८७ | स्वाम्युक्ते यो न (भो जय २७) १४४।९९ | हन्तालि सतापनिवृत्तये २८४।११ |
| स्वर्गौकोभिरदोनवासि २८।१ | स्वाम्ये पेशलता गुणे (सु २६६) ५३।२७४ | हन्तुं मेषो (शा प.१४०२) १६६।५७७ |
| स्वर्णच्छवीनाम २६१।१३५ | स्वायत्तमेकान्तगुणं (भर्तृ स ६८) ८६।३ | हन्तुर्बन्धुजनानन्धनार्थम ६३।३९ |
| स्वर्णविदातद्युति २६७।३५४ | स्वार्थ धनानि (भामिनी प्रा ९६) ७३।३२ | हरः क्षयी तापकर १९६।१० |
| स्वर्णै स्कन्धपरि (शा प ९८८) २३७।३४ | स्वार्थनिरपेक्ष एव हि (सु ४१९) ५८।१९० | हरकण्ठग्रहानन्द (शा प.६८) ११।१ |
| स्वर्गेणाजिनशयनेो २०।७७ | खिन्नं केन मुख दिवा २९३।११ | हरक्रोधज्वालावलिभि २६८।३६४ |
| स्वर्भानु सुरवर्त्मनानु ५।५८ | खिन्नं मण्डलम्रै (भोज प्र २५२) ३१९।४२ | हरनयनहुताशज्वालया २०६।२ |
| स्वर्भानुप्रतिवारपार २८।३ | खिन्नौ गण्डौ स्फुरित २७६।४१ | हरन्ति हृदयानि (विद्ध शा ४ ४) ३३६।२४ |
| स्वर्भानुराकलपितुं २५७।२२ | स्वीया सन्ति गृहे गृहे ३५६।६ | हरसुकुटे सुरतटिनी (शा प.७५१) २०९।७ |
| स्वर्लोकस्य (भामिनी प्रा ५५) २४८।८१ | स्वीयोद्यानप्रगन्धप्रकुपित १२३।४ | हरवञ्च विष (का.प्र.१० ४६८) १०३।८० |
| स्वर्वामामृतपान ३०२।१०८ | स्वेच्छाभङ्गुर भाग्यमेघ (सु १६६) ३४।५६ | हरशिरसि शिरासि यानि ९२।६३ |
| स्वल्पं ब्रूम किमपि १३२।२४ | स्वेदक्रेदितकङ्कणा २०८।३८ | हरिणचरण (शांति.श २.१६) १४०।२ |
| स्वल्पम्नायुवसाव (भर्तृ स ३५०) ७९।२२ | स्वेदस्ते कथमीदृश (शा प १०४) १२।३५ | हरिणप्रेक्षणा यत्र (रसग.प्र १) २५१।८ |
| स्वल्पा इति राम १६९।७३७ | स्वेदस्यन्दितसान्द्रचन्दन १२।३४ | हरिणापि हरेणापि (विक्रमचं.२३०) ९१।१५ |
| स्वल्पापि साधु सप (सु २३५) ४८।१३७ | स्वेदाम्भ कण (द रू २.१७) १२०।१४५ | हरिद्राया राहुप्रसर १९१।८१ |
| स्ववश करोति (शा प ४३९) १७१।८०५ | स्वेदाईवामकुचमण्डन १११।६४ | हरिभामिनि सिन्धुसभवे ६२।२० |
| स्वसुखनिर (अ शाकु ५ ७) १०६।१६६ | स्वे स्वे कर्मणि सनि ३३७।५० | हरिरलसवि (शा प ९०४) २३०।२५ |
| स्वस्तिक्षत्रियदे (शा प ५०१) १८१।१७ | स्वैरं कैरवकोर (प्र रात्रव ७ ६१) ३०१।९३ | हरिवैदति का तवास्त्यरिषु २०३।१०४ |
| स्वस्ति स्वागतमर्थ्यह(सु ८६) २०।६४ | स्वैर सस्मितमीक्षते २७४।२९ | हरिष्यमाणो बहुधा ३७३।१६८ |
| स्वस्त्यस्तु विद्रुमवना (सु ८९०) २१६।१६ | ह | हरे. पदाहति श्लाघ्या ४५।२२ |
| स्वस्थानादपि विचलति ४८।१२८ | हंस श्वेतो बक श्वेत. २२।१६ | हरेर्लीलावराइस्य (भर्तृ.सं.८२०) १८।२५ |
| स्वस्वव्यावृति (भामिनी प्रा ५६) २२८।२०२ | हंस प्रयच्छ (विक्रमोर्व ४ ३३) २८३।१६२ | हर्तुनं गोचरं याति दत्ता २९।४ |
| स्वातन्त्र्यं पितृम (हि १ ११४) ३५०।७५ | हंसः प्रयाति (शा प.११८२) २२१।२२ | हर्तुर्याति न गोचरं. (भर्तृ सं.१५) ३९।२८ |
| स्वात्मन्येव लयं याति (सु.२१७) ४६।७४ | हंसश्चन्द्र इवाभाति ३४४।९ | हर्म्यस्थानमधर्मकर्मनित ९९।२७ |