सुगम चिकित्सा
Sugam Chikitsa
आचार्य चतुरसेन शास्त्री द्वारा
स्रोत: June 1939 First Edition · सस्ता साहित्य मण्डल, दिल्ली (Sasta Sahitya Mandal, Delhi) · 1939 (उद्गम)
पृष्ठ 28, कुल 222 में से
संदर्भ में पढ़ें२३
ऋतु-चर्या
भीगने से बचना जरूरी है। घर के चारों ओर घास-फूस न इकट्ठी होने देना चाहिए, न सील होने देना चाहिए। हवादार छप्पर या वरांडे में सोना, मच्छरों से बचना और मच्छरदानी काम में लाना बहुत जरूरी है। नीम की लकड़ी के घुएँ से मच्छर भागते हैं। दही-छाछ, उर्दू की दाल, नदी स्नान, वारिश में भीगना त्याग देना चाहिए।
शरद ऋतु में पित्त का कोप होता है। इसलिए मौसमी बुखार आता है। घी के बने भोजन, गेहूँ, जो, चना, मूँग, चावल आदि शरद पदार्थ खाने चाहिए। यह मौसम जुलाब के लिए अच्छा है। ज्यादा मिहनत न करे, गरम चटपटे पदार्थ न खाय, दिन में न सोवे, सर्दी और धूप से बचे।
हेमन्त में उत्तरी हवा चलती है। यह ऋतु ठण्डी और बलकारी है। खट्टे-मीठे, नमकीन पदार्थ खाय। तेल हेमन्त मालिश करे। गेहूँ, उर्दू, बाजरा, तिल, ईख का गर्म रस, सेवन करे। गर्म कपड़े पहने। शिशिर में भी हेमन्त की भांति रहे।
जो आदमी तन्दुरुस्त रहना चाहता है उसे चाहिए कि रोज के काम-काज, खान-पान, रहन-सहन ऋतु और अपनी शक्ति के अनुसार रखे। मन, बचन, कर्म से पवित्र रहे। ईश्वर से डरता रहे। दीन दुखियों पर दया रखे। पड़ोसियों और सम्बन्धियों से प्रेम रखे। सत्य व्यवहार करे। काम, क्रोध, लोभ, मोह से दूर रहे। मन और इन्द्रियों को वश में रखे। क्रोध न करे। झोटों का अपराध चूमा करे। मेहमानों की खातिर करे। मीठा बोले। पराई खी और