सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)
Sundar Vilas of Sant Sundardas with Hindi Commentary
सन्त सुन्दरदास जी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें॥ चांनक कौ अग ॥ [ ६१ मेघ सहै शीत कहै शीश पर घाम सहै, कठिन तपस्या करि कंद मूल खात है । जोग करै जज्ञ करै तीरथ ऊ ब्रत करै, पुनि नाना विधि करै मन मैं सिहात है ॥ और देवी देवता उपासना अनेक करै, आमनि की हौंस कैसे आकडोडे जात है । सुन्दर कहत एक रवि के प्रकाश बिन, जैंगनें की ज्योति कहा रजनी विलात है ॥५॥ आप ही कै घट मैं प्रगट परमेश्वर है, ताहि छोडि भूलै नर दूर दूर जात है । कोई दौरै द्वारिका कौ कोई काशी जगनाथ, कोई दौरै मथुरा कौ हरिद्वार न्हात है ॥ कोई दौरै बद्रीनाथ विषम पहाड चढि, कोई तौ केदार जात मन मैं सिहात है । सुन्दर कहत गुरुदेव देहि दिव्य नैन, दूरि ही कै दूरवीन निकट दिखात है ॥६॥ (५) हौंस-इच्छा । अकडोडे-आकडे का डोडा । जैंगने की जोति-जुगनू की चमक । (६) सिहात है-अहंकार करता है । विषम-कठिन । (७) आधर्रैनि-अ धोने ।