भारतकोश
सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)

सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)

Sundar Vilas of Sant Sundardas with Hindi Commentary

सन्त सुन्दरदास जी द्वारा

DevanagariHindipublished284 पृष्ठ

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६२ ] ॥ सुन्दर विलास ॥ कोऊ फिरै नागे पाउ कोऊ गूदरी बनाउ, देह की दशा दिगाउ बाद लोन गूट्यो है । कोऊ दूनाहारी होइ कोऊ फलहारी तोइ, कोऊ अधोमुख भूनि भूनि धूम घूट्यो है ॥ कोऊ नहि खाहि लोन कोऊ मुख गहे मौन, सुन्दर कहत यां ही वृथा भुम कूट्यो है । प्रभुसों न प्रीति माहि, ज्ञानसों पच्चै नाहि, देखो भाई आंधरैनि ज्यों बाजार लूट्यो है ॥७॥ इन्द्रव छंद आसन मारि सवारि जटा नस, उज्ज्वल अग विभूति चढाई । या हमकौ कछु देइ, दया करि, घेरि रहे बहु लोग लुगाई ॥ कोउक उत्तम भोजन ल्यावत, कोउक ल्यावत पान मिठाई । सुन्दर लै करि जान भयौ सब, मूरख लोगन या सिधि पाई ॥८॥ ऊरध पाइ अधोमुख व्है करि, घुटत घूमहि देह भुलावै । मेघहु शीतहु घाम सहै सिर, तीनहु काल महा दुख पावै ॥ हाथ कछू न परै कबहूकन, मूरिख कूकस कूटि उडावै ।