सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)

सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)
Sundar Vilas of Sant Sundardas with Hindi Commentary
सन्त सुन्दरदास जी द्वारा
DevanagariHindipublished284 पृष्ठ
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॥ चानक को अंग ॥ [ ६३ सुन्दर बछि बिषै सुख कौं घर, बूडत है अरु झाझन गावै ॥६॥ ग्रेह तज्यौ अरु नेक तज्यौ पुनि, खेह लगाइ कै देह सवारी । मेघ सहै सिर शीत सह्यौ तनु, धूप सहै जु पचागनि बारी ॥ भूख सही रहै रूख तरै परि, सुन्दर दास सहै दुख भारी । डासन छाडि कै कासन ऊपरि, आसन मार्यौ पै आश न मारी ॥१०॥ जौ कोड कष्ट करै बहुभातिनि, जात अज्ञान नही मन केरौ । ज्यौ तम पूरि रह्यौ घर भीतर, कैसेहु दूर न होत अधेरौ ॥ लाठिनि मारिये ठेलि निकारिये, और उपाइ करै बहुतेरौ । सुन्दर सूर प्रकाश भयौ तब, तौ कतहू नहि देखिये नेरौ ॥११॥ (६) ऊरध-ऊपर । पाइ पैर । घुटत घूमहि-धु ए मे घुटते हैं । (१०) ग्रेह-घर । खेह-भस्मी । पचागनि-पचाग्नि । रूख-वृक्ष । डासन-विछोना । कासन-घास की चटाई ।