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सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)

Sundar Vilas of Sant Sundardas with Hindi Commentary

सन्त सुन्दरदास जी द्वारा

DevanagariHindipublished284 पृष्ठ

॥ चांनक कौ अग ॥ [ ६१ मेघ सहै शीत कहै शीश पर घाम सहै, कठिन तपस्या करि कंद मूल खात है । जोग करै जज्ञ करै तीरथ ऊ ब्रत करै, पुनि नाना विधि करै मन मैं सिहात है ॥ और देवी देवता उपासना अनेक करै, आमनि की हौंस कैसे आकडोडे जात है । सुन्दर कहत एक रवि के प्रकाश बिन, जैंगनें की ज्योति कहा रजनी विलात है ॥५॥ आप ही कै घट मैं प्रगट परमेश्वर है, ताहि छोडि भूलै नर दूर दूर जात है । कोई दौरै द्वारिका कौ कोई काशी जगनाथ, कोई दौरै मथुरा कौ हरिद्वार न्हात है ॥ कोई दौरै बद्रीनाथ विषम पहाड चढि, कोई तौ केदार जात मन मैं सिहात है । सुन्दर कहत गुरुदेव देहि दिव्य नैन, दूरि ही कै दूरवीन निकट दिखात है ॥६॥ (५) हौंस-इच्छा । अकडोडे-आकडे का डोडा । जैंगने की जोति-जुगनू की चमक । (६) सिहात है-अहंकार करता है । विषम-कठिन । (७) आधर्रैनि-अ धोने ।

६२ ] ॥ सुन्दर विलास ॥ कोऊ फिरै नागे पाउ कोऊ गूदरी बनाउ, देह की दशा दिगाउ बाद लोन गूट्यो है । कोऊ दूनाहारी होइ कोऊ फलहारी तोइ, कोऊ अधोमुख भूनि भूनि धूम घूट्यो है ॥ कोऊ नहि खाहि लोन कोऊ मुख गहे मौन, सुन्दर कहत यां ही वृथा भुम कूट्यो है । प्रभुसों न प्रीति माहि, ज्ञानसों पच्चै नाहि, देखो भाई आंधरैनि ज्यों बाजार लूट्यो है ॥७॥ इन्द्रव छंद आसन मारि सवारि जटा नस, उज्ज्वल अग विभूति चढाई । या हमकौ कछु देइ, दया करि, घेरि रहे बहु लोग लुगाई ॥ कोउक उत्तम भोजन ल्यावत, कोउक ल्यावत पान मिठाई । सुन्दर लै करि जान भयौ सब, मूरख लोगन या सिधि पाई ॥८॥ ऊरध पाइ अधोमुख व्है करि, घुटत घूमहि देह भुलावै । मेघहु शीतहु घाम सहै सिर, तीनहु काल महा दुख पावै ॥ हाथ कछू न परै कबहूकन, मूरिख कूकस कूटि उडावै ।

॥ चानक को अंग ॥ [ ६३ सुन्दर बछि बिषै सुख कौं घर, बूडत है अरु झाझन गावै ॥६॥ ग्रेह तज्यौ अरु नेक तज्यौ पुनि, खेह लगाइ कै देह सवारी । मेघ सहै सिर शीत सह्यौ तनु, धूप सहै जु पचागनि बारी ॥ भूख सही रहै रूख तरै परि, सुन्दर दास सहै दुख भारी । डासन छाडि कै कासन ऊपरि, आसन मार्यौ पै आश न मारी ॥१०॥ जौ कोड कष्ट करै बहुभातिनि, जात अज्ञान नही मन केरौ । ज्यौ तम पूरि रह्यौ घर भीतर, कैसेहु दूर न होत अधेरौ ॥ लाठिनि मारिये ठेलि निकारिये, और उपाइ करै बहुतेरौ । सुन्दर सूर प्रकाश भयौ तब, तौ कतहू नहि देखिये नेरौ ॥११॥ (६) ऊरध-ऊपर । पाइ पैर । घुटत घूमहि-धु ए मे घुटते हैं । (१०) ग्रेह-घर । खेह-भस्मी । पचागनि-पचाग्नि । रूख-वृक्ष । डासन-विछोना । कासन-घास की चटाई ।

६४ ] ॥ सुन्दर विलास ॥ धार वह्यो खग धार हणौ, जल धार सह्यौ गिरिधार गिर्यौ है । भार सच्यौ धन भारथ हू करि, भार लयौ सिर भार पर्यौ है ॥ मार तप्यौ वहि मार गयौ, जम मार दई मन् तौ न मर्यौ है । सार तज्यौ खुट सार पढ्यौ, कहि सुन्दर कारिज कौन सर्यौ है ॥१२॥ कोउ भया पय पान करै नित, कोउक खात हैं अन्न अलौनां । कोउक कष्ट करै निशवासगं, कोउक बैठि कै साधत पौना ॥ कोऊक बाद बिवाद करै अति, कोउक धारि रहै मुख मौना । सुन्दर एक अज्ञान गये बिनु, सिद्ध भयौ नहिं दीसत कौना ॥१३॥ (१२) खग-खड्ग, तलवार । भारथ हूकार-बैल की तरह पचरकर। खुट-खोटा ।

॥ चानक को अंग ॥ [ ६५ कोउक अंग बिभूति लगावत, कोउक होत निराट दिगम्बर । कोउक श्वेत कषाइक ओढत, कोउक काथ रंगै बहु अम्बर ॥ कोउक बलकल शीश जटा नख, कोउक ओढत है जु बघबर । सुन्दर एक अज्ञान गये बिनु, ये सब दीसत आहि अडबर ॥१४॥ कोउक जात पिराग बनारस, कोउ गया जगनाथ ही धावै । को मथुरा बदरी हरिद्वार सु, कोउ भया कुरुखेत हि न्हावै ॥ कोउक पुष्कर व्है पच तीरथ, दौरैइ दौरै जु द्वारका आवै । सुन्दर बित्त गड़्यौ घर माहि सु, बाहिर ढूंढत क्यौ करि पावै ॥१५॥ आगै कछू नहिं हाथ पर्यौ पुनि, पीछै विगारि गये निज भौना । ज्यौ कोऊ कामिनि कत हि मारि, चली सग और हि देखि सलौना ॥ (१५) पिराग-प्रयाग । वित्त-धन ।

६६ ] ॥ सुन्दर विलास ॥ सोऊ गयौ तजिकै ततकाल, कहै न बनै जु रही मुख मौना । तैसै हि सुन्दर ज्ञान बिना सब, छाडि भये नर भाड कै दौना ॥१६॥ ज्यौ कोउ कोस कट्यौ नही मारग, तेलकले घर मैं पशु जोये । ज्यौ बनिया गयौ बीस कै तीस कौ, बीस हु मै दमहू नहिं होये ॥ ज्यौ कोउ चौबे छब्बे कौं चल्यौ पुनि, होइ दुबे दुई गाठ के खोये । तैस हि सुन्दर और क्रिया सब, गम बिना निहचै नर रोये ॥१७॥ जो कोउ राम बिना नर मूरिख, औरन के गुन जीभ भनैगी । आनि क्रिया गढतै गडवा पुनि, होत है भेरि कछू न बनैगी ॥ ज्यौ हथफेरि दिखावत चावर, अन्त तौ धूरि की धूरि छनैगी । सुन्दर भूल भई अतिसै करि, सूते की भैस पाडा ई जनैगी ॥१८॥ (१६) सलोना-सुन्दर । कत-अपना पति । (१७) तेलकले-तेल निकालने की घाणी, कोल्हू ।

॥ चानक को अंग ॥ [ ६७ होइ उदास बिचार बिना नर, गेह तज्यौ बन जाइ रह्यौ है । अंबर छाडि बघंबर लै करि, कै तप कौ तन कष्ट सह्यौ है ॥ आसन मारि शवासन ह्वै, मुख मौन गही, मन तौ न गह्यो है । सुन्दर कौन कुबुद्धि लगी कहि, या भवसागर माँहि बह्यौ है ॥१९॥ भेष धर्यौ पर भेद न जानत, भेद लहे बिनु खेद ही पैहै । भूख हा मारत नीद निवारत, अन तजै फल पत्रनि खैहै ॥ और उपाइ अनेक करै पुनि, ताहि तै हाथ कछू नहीं ऐहै । या नर देह वृथा शठ खोवत, सुन्दर राम बिना पछितैहै ॥२०॥ आपुने आपुने थान मुकाम, सराहन कौ सब बात भली है । यज्ञ ब्रतादिक तीरथ दान, पुरान कथा जु अनेक चली है ॥ केतिक और उपाइ जहा लग, ते सुनि कै नर बुद्धि छली है ।

६८ ] ॥ सुन्दर विलास ॥ सुन्दर ज्ञान विना न कहू सुख, भूलनि की बहु भाति गली है ॥२१॥ कोउक चाहत पुत्र धनादिक, कोउक चाहत वाझ जनायौ । कोऊक चाहत धात रसायन, कोउक चाहत पारद खायौ ॥ कौउक चाहत जन्त्रनि मन्त्रनि, कोउक चाहत रोग गमायौ । सुन्दर राम विना सब ही भ्रम, देखहु या जग यौँ डहकायौ ॥२२॥ काहे कौ तू नर भेख बनावत, काहे कौ तू दस हू दिसि डूलै । काहे कौ तू तन कपट करै अति, काहे कौ तू मुख तै कहि फूलै ॥ काहे कौ और उपाइ करै अब, आन क्रिया करिके मति भूलै । सुन्दर एक भजै भगवत हि, तौ सुखसागर मैं नित भूलै ॥२३॥ ॥ इति चांनक को अंग ॥

॥ विपरीत ज्ञानी को अंग ॥ [ ६६ अथ बिपरीत ज्ञानी को अंग ॥१३॥ मनहर छंद 'एक ब्रह्म' मुख मौ बनाइ करि कहत है, अंतहकरन तौ बिकारनि सौ भर्यौ है । जैसैं ठग गोबर सौ कूपौ भरि राखत है, सेर पाच घृत लै के ऊपर ज्यौ कर्यौ है ॥ जैसे कोऊ भाडे माँहि प्याज कौ छिपाइ राखै, चीथरा कपूर कौ लै मुख बाधि धर्यौ है । सुन्दर कहत ऐसे ज्ञानी है जगत माहि, तिनकौ तौ देखि करि मेरौ मन डर्यौ है ॥१॥ देह सौ ममत्त पुनि गेह सौ ममत्त सुत, दारा सौ ममत्त मन माया मैं रहतु है । थिरता न लहै जैसै कदुक चौगान माहि, कर्मनि कै वसि मार्यौ थका कौ बहुतु है ॥ अंतहकरन मु तौ जगत सौ रचि रह्यौ, मुख सौ बनाइ बात ब्रह्म की कहतु है । सुन्दर अधिक मोही याही तै अचंभौ आहि, भूमि पर पर्यौ कोऊ चन्द कौ गहतु है ॥२॥ मुख सौ कहत ज्ञान, भ्रमै मन इन्द्रिय प्रान, मारग कै जल मैं न प्रतिबिंब लहिये ।

१०० ] ॥ सुन्दर विलास ॥ गाठि मे न पैका कोऊ भयौ रहै साहूकार, बातनि ही मुहर रुपैया गिनि गहिये ॥ सुपने मैं पचामृत जीमि कै तृपति भयौ, जागै तै मरत भूख खाइबे कौ चहिये । सुन्दर सुभट जैसे काइर मारत गाल, राजा भोज सम कहा गगौ तेली कहिये ॥३॥ संसार के सुखनि सौ आसक्त अनेक विधि, इन्द्रिय हू लोलुप मन कबहू न गह्यौ है । कहत है ऐसै मै तो एक ब्रह्म जानत हू, ताहि तै छोडी कै शुभ कर्मन कौ रह्यौ है ॥ ब्रह्म की न प्राप्ति पुनि कर्म सब छूटि गये, दहुन तै भ्रष्ट होइ अधबिच बह्यौ है । सुन्दर कहत ताहि त्यागिये श्वपच जैसे, याही भांति ग्रन्थ मै वसिष्ठजी हू कह्यौ है ॥४॥ ज्ञान की सी बात कहै मन तौ मलीन रहै, वासना अनेक भरी नैकु न निवारि है । जैसे कऊ आभूषण अधिक बनाइ राख्यो, कलई ऊपरि करि भीतरि भगारि है ॥ ज्यौही मन आवै त्यौही खेलत निसंक होड, ज्ञान सुनि सीख लयौ ग्रथनि विचारि है । सुन्दर कहत वाकै अटक न कंऊ आहि, जोई वासौ मिलै जाइ ताहि कौ विगारि है ॥५॥

॥ विपरीत ज्ञानी को अंग ॥ [ १०१ हंस श्वेत बक श्वेत देखिये समान दोऊ, हंस मोती चुगै बक मछरी कौ खात है । पिक अरु काक दोऊ कैसे करि जाने जाहि, पिक अंब डार काक करक हि जात है ॥ सिधौ अरु फटक पखान सम देखियत, वह तौ कठोर वह जल मैं समात है । सुन्दर कहत ज्ञानी बाहिर भीतर शुद्ध, ताकी पटतर और बातनि की बात है ॥६॥ ॥ इति विपरीत ज्ञानी को अंग सम्पूर्ण ॥ (१) कूपो-घड़ा, कलशा । (४) श्वपच-चांडाल । (६) पटतर-समान ।

१८२ । ॥ सुन्दर विलास ॥ अथ बचन विवेक को अंग ॥४२॥ जाकै पद माथौ प्रवीन सो-ऐसो बन्यौ, ताकै आगे फेरि फेरि हत्था दबाइये । जाहि नाना भेष भेष सिगाराइ सुन्दर, ताकै आगे पानि पनि जोडि नवाइये ॥ जाके पञ्चामृत पान गान सब दिन बीते, सुन्दर रहन नाहि गलगै लगाइये । चतुर प्रवीन आगे मूरख उधार पने, मूरज पै आगे जैसे जेमना जिवाइये ॥१॥ एक वानी रूपवंत भगवंत अग, अधिक विराजमान हिरन ऐनी है । एक वानी फाटे टूटे अम्बर उठाये यानि नाह माहि त्रिपरीत मुनिजन नैनी है ॥ एक वानी मस्तक ही बहुत सिगार किये लोकनि कों नीकी लगै मतनि कौ भंगी है । सुन्दर कहत वानी त्रिविध जगत मांहि जानै कोऊ चतुर प्रवीन जाकै जैसी है ॥२॥ राजा को कुंवर जी सुरूप कै कुरुप होइ, ताकौ तमजीम करि गोद लै खिलाइये ॥ और काहू रैनि कै सुरूप होइ सोभनीक, ताहू कौ तौ देखि करि निकट बुलाइये ॥

॥ वचन विवेक को अंग ॥ [ १०३ काहू के कुरूप कारौ कूबरौ व्है अंगहीन, वाकी और देखि देखि माथौ ई हलाइये । सुन्दर कहत वाके बाप ही कौ प्यारौ लागे, यौ ही जानि बानी कौ विवेक ऐसैं पाइये ॥३॥ बोलिये तौ तब जब बोलिबे की सुधि होइ, न तौ मुख मौन गहि चुप होइ रहिये । जोरिये ऊ तब जब जोरिबो ऊ जानि परै, तुक छंद अरथ अनूप जामैं लहिये ॥ गाइये ऊ तब जब गाइवे कौ कंठ होइ, श्रवन के सुनत ही मन जाइ गहिये । तुक भग छंद भग अरथ मिले न कछु, सुन्दर कहत ऐसी वानी नही कहिये ॥४॥ एकनि के बचन सुनत अति सुख होइ, फूल से झरत है अधिक मन भावने । एकनि के बचन अश्म मानौ वरषत, श्रवन के सुनत लगत अलखावने ॥ एकनि के वचन कटक कटु बिष रूप, करत मरम छेद दुख उपजावने । सुन्दर कहत घट घट मैं वचन भेद, उत्तम मधिम और अधम सुनावने ॥५॥

१०४ ] ॥ सुन्दर विलास ॥ काक अरु गदर्भ ऊंटहू जब बोलत हैं, तिनके तो वचन सुहात नहिं पीव की । कोकिला ऊ मागे पुनि सूवा जब बोलत हैं, तब कोऊ कान दै सुनत रव गीत की ॥ ताहि तें सुवचन विवेक करि बोलियत, गोहि थार यार बकि तोलियै न पोल को । सुन्दर समुझि के बोल को उचार करि, नाहिं तर चुप ह्वै पहरि बैठि मौन की ॥६॥ प्रथम हिये विचारि, सीम सो न दीजै डारि, नाहिंनं सुवचन सम्भारि करि बोलिये । जाने न कुहेत हेत भावै तैसी कहि देत कहिये तो तब जब मन माहिं तोलिये ॥ सबही की लागै दुख कोऊ नहिं पावै सुख, बोलिके वृथा ही तान छानी नहीं छानिये । सुन्दर समुझि करि कहिये सरस बात, तब ही तो बदन कपाट गहि खोलिये ॥७॥ वचन ऐसैं बोलत हैं पसु जैसे, तिनके तो बोलिवे मैं ढग हू न एक है । कोऊ राति दिवस बकत ही रहत ऐसें, जैसी विधि कूप मैं वकत मानो भेक है ॥

॥ बचन बिवेक को अंग ॥ [ १०५ बिबिध प्रकार करि बोलत जगत सब, घट घट मुख मख बचन अनैक है । सुन्दर कहत तातै बचन बिचारि लेहु, बचन तौ उहै जामै पाइये बिवेक है ॥८॥ जैसे हस नीर कौ तजत है असार जानि, सार जानि क्षीर कौं निरालौ करि पीजिये । जैसे दधि मथत मथत काढि लेत घृत, और रही पही सब छाछि छाडि दीजिये ॥ जैसे मधु मक्षिका, सुवास कौ भूमर लेत, तैसे ही बिचारि करि भिन्न भिन्नकीजिये । सुन्दर कहत तातै बचन अनेक भाँति, बचन मैं बचन विवेक करि लीजिये ॥६॥ प्रथम ही गुरुदेव मुख तै उचार कर्यो, वैई तौ बचन आइ लगे निज हीये हैं । तिनकौ बिवेक करि अन्तहकरन माहि, अति ही अमोल नग भिन्न भिन्न कीये हैं ॥ आपु कौ दरिद्र गयौ पर उपकार हेत, नग हि निगल कै उगलि नग दीये हैं । सुन्दर कहत यह वानी यौ प्रगट भई, और कोऊ सुनि करि रक जीव जीये है ॥१०॥

१०६ ] ॥ सुन्दर विलास ॥ वचन तैं दूरि भिरै वचन चित्त होइ, वचन तैं राग बढ़ै, वचन तैं दोष जू । वचन तैं ज्वाला उठै, वचन सीतल होइ, वचन तैं मुदित, वचन ही तैं सोच जू ॥ वचन तैं प्यारौ लगे, वचन तैं दूरि भगे, वचन तैं सुम्भार वचन तैं पोच जू । सुन्दर कहत यह वचन ही भेद ऐसौ, वचन तैं बंध होइ, वचन तैं मोक्ष जू ॥११॥ वचन तैं गरु मित्र बाप पूत प्यारो होइ, वचन तैं बहु विधि होत उतपात हैं । वचन तैं नारी अरु पुरुष सनेह अति, वचन तैं दोऊ आपु आपु में रिसात हैं । वचन तैं नव आइ राजा के हजूरि होहि, वचन तैं चाकर ऊ छोड़ि कै परात हैं । सुन्दर सुवचन सुनत अति सुख होइ, कुबचन सुनत ही प्रीति घटि जात ह ॥१२॥ एक तौ वचन सुन कर्म ही मैं बहि जाहि, करत बहुत विधि सुरग की उमेद है । एक है वचन दिढ ईश्वर उपासना कै, तिनमैं तौ सकल ही वासना कौ छेद है ॥

वचन विवेक को अंग ॥ [ १०७ एक है बचन तामैं एक ही अखंड ब्रह्म, सुन्दर कहत यौ बतायौ अ्रत वेद है । बचन अनेक ही प्रकार सब देखियत, बचन विवेक किये बचन मै भेद है ॥१३॥ बचन तै जोग करै, बचन तै जज्ञ करै, बचन तै तप करि देह कौ दहतु है । बचन तै बंधन करत है अनेक बिधि, बचन तै त्याग करि बन मैं रहतु है ॥ बचन तै उरझि रु सुरझै बचन ही तैं, बचन तै भांति भांति सकट सहतु है, बचन तै जीव भयौ बचन तै ब्रह्म होइ, सुन्दर बचन भेद बेद यौ कहतु है ॥१४॥ ॥ इति वचन विवेक को अ्रग सम्पूर्ण ॥ (१) ताजी-अरबी । तुरकीन-घोडा । (५) अ्रशम-अश्म, पत्थर । (६) रासभ-गधा । सारो-सारिका, मैना । रव-शब्द । रौन-रमणीय, सुन्दर । पौन-प्राणवायु ।

१०८ ] ॥ सुन्दर विलास ॥ अथ निर्गुण उपासना को अंग ॥१५॥ इन्द्रवज्रा ब्रह्मा कुलाल रचै बहु भाजन, कर्मनि के दधि मोहि न भावै । विष्नु हू मकट आठ गहै सब, ताहू कौ रक्षक काहु मनावै ॥ संकर भूत पिषाचनि के पति, पानि कपाल लिये बिललावै । ताहि तें सुन्दर निरगुन त्यागि सु, निर्मल एक निरंजन ध्यावै ॥१॥ कोटिक बात बनाइ कहै कहा, होत भया सब ही मन रंजन । शास्तर स्मृति वेद पुरान, बखानत है अतिशै लुक अंजन ॥ पानी मैं बूडत पानी गहै कत, पार पहूचत है मति भजन । सुन्दर तौ लग आंधेकी जेवरी, जौलौं न ध्याइ है एक निरंजन ॥२॥ (१) कुलाल-कुम्हार की तरह । भाजन-बर्तन । पानि- पाणि, हाथ मे । (२) मति भजन मदमति मूर्ख ।

॥ निर्गुण उपासना को अंग ॥ [ १०६ मजन सो जु मनोमल मजन, सज्जन सो जु कहै गति गुझैं । गजन सो जु इन्द्रिय गहि गजत, रंजन सो जु बुझावै अबुझैं ॥ भजन सो जु भर्यौ रस माहि, बिदुज्जन सो कतहू न अरुझैं । व्यजन सो जु बढै रुचि सुन्दर, अजन सो जु निरंजन सुझैं ॥३॥ जा प्रभु तैं उतपत्ति भई यह, सो प्रभु है उर इष्ट हमारै । जो प्रभु है सबकें सिर ऊपरि, ता प्रभु कौ हम हू सिर धारै ॥ रूप न रेख अलेख अखंडित, भिन्न रहै सब कारिज सारै । नाम निरंजन है तिनकौ पुनि, सुन्दर ता प्रभु कै बलिहारै ॥४॥ जो उपजै बिनसै गुन धारत, सो यह जानहु अजन माया । आवै न जाइ मरै नहिं जीवत, अच्युत एक निरंजन राया ॥ ज्यो तरु तत्त रहै रस एक हि, आवत जात फिरै यह छाया ।

११० ] ॥ सुन्दर विलास ॥ सो परब्रह्म सदा सिर उपरि, सुन्दर सो प्रभु सो मन माना ॥५॥ जो उपज्यो कछु प्राह जरा लग, सो सब नाश निरंतर होई । रूप धर्यो जु रहै नहिं निश्चय, तीनों लोक सबै कहा होई ॥ राजस तामस सात्त्विक जागत, देखत काल सबै पुनि खोई । आपु हि एक रहै जु निरंजन, सुन्दर के मन मानत सोई ॥६॥ देवनि के सिर देव विराजत, ईश्वर के सिर ईश्वर कहिये । लालनि के सिर लाल निरंतर, खूबन के सिर खूब सु लहिये ॥ पावनि के सिर पाक शिरोमणि, देखि विचारि उहै दृढ गहिये । सुन्दर एक सदा सिर ऊपरि, और कछू हमकौं नहिं चहिये ॥७॥ शेष महेश गणेश जहां लग, विष्णु विरंचिहु के सिर स्वामी ।