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सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)

सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)

Sundar Vilas of Sant Sundardas with Hindi Commentary

सन्त सुन्दरदास जी द्वारा

DevanagariHindipublished284 पृष्ठ

पृष्ठ 170, कुल 284 में से

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पृष्ठ 170

॥ आपने भाव को अंग ॥ [ १६१ अथ आपने भाव को अंग ॥२३॥ इन्द्रव छंद एकही आपुनो भाव जहां तहां, बुद्धि के योग तैं विभ्रम भासै। जो यह क्रूर तो क्रूर उहा पुनि, यांकै मानै तैं उहा पुनि त्रासै ॥ जो यह साधु तो साधु उहा पुनि, याके हासै तैं उहा पुनि हासै। जैसो ई आपु करै मुख सुन्दर, तैसो ई दर्पन मांहि प्रकासै ॥१॥ मनहर छंद जैसे स्वान कांच के सदन मधि देखि धौन, भोंकि भोंकि मरत करत अभिमान जु । जैसे गज पंडित फिना नी भाँति नींवै दंत, ऐसे रिपु कूप मांहि झंपिक भुजान जु ॥ जैसे कोउ फेरी हाथ फिरत देखै जगत, तैसे ही गूनर मत जैसो ई पहिचान जु । आप ही तैं आपन को दूसरो परापर होत, भूलि तौ विचारै कोइ परखो न आन जु ॥२॥

सांझ समय सो भावता, सभी मुख विचार कफ १ ।

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