सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)
Sundar Vilas of Sant Sundardas with Hindi Commentary
सन्त सुन्दरदास जी द्वारा
॥ आपने भाव को अंग ॥ [ १६१ अथ आपने भाव को अंग ॥२३॥ इन्द्रव छंद एकही आपुनो भाव जहां तहां, बुद्धि के योग तैं विभ्रम भासै। जो यह क्रूर तो क्रूर उहा पुनि, यांकै मानै तैं उहा पुनि त्रासै ॥ जो यह साधु तो साधु उहा पुनि, याके हासै तैं उहा पुनि हासै। जैसो ई आपु करै मुख सुन्दर, तैसो ई दर्पन मांहि प्रकासै ॥१॥ मनहर छंद जैसे स्वान कांच के सदन मधि देखि धौन, भोंकि भोंकि मरत करत अभिमान जु । जैसे गज पंडित फिना नी भाँति नींवै दंत, ऐसे रिपु कूप मांहि झंपिक भुजान जु ॥ जैसे कोउ फेरी हाथ फिरत देखै जगत, तैसे ही गूनर मत जैसो ई पहिचान जु । आप ही तैं आपन को दूसरो परापर होत, भूलि तौ विचारै कोइ परखो न आन जु ॥२॥
सांझ समय सो भावता, सभी मुख विचार कफ १ ।
१६२ ] ॥ सुन्दर विलास ॥ नीच ऊंच बुरौ भलौ सुजन दुर्जन पुनि, - पंडित मूरख शत्रु मित्र रक राव है। मान अपमान पुन्य पाप सुख दुख दोऊ, स्वरग नरक बध मोक्ष हू कौ चाव है॥ देवता असुर भूत प्रेत कीट कुंजर ऊ, पशु अरु पंखी श्वान शूकर बिलाव है। सुंदर कहत यह एकई अनेक रूप, जोई कछु देखिये सु आपुनौ ई भाव है ॥३॥ याहीकै जागत काम याहीकें जागत क्रोध, याही कै जागत लोभ याही मोह मातौ है। याकौ याही बैरी होत याकौ याही मित्र होत, याकौ याही सुख देत याही दुख दातौ है॥ याही ब्रह्मा याही रुद्र याही विष्णु देखियत, याही देव दैत्य यक्ष सकल संघाती है। याही कौ प्रभाव सु तौ याही कौं दिखाई देत, सुंदर कहत याही आत्मा विख्यातौ है ॥४॥ याही कौ तौ भाव याकौ शक उपजावत है, याही कौ तौ भाव याही निशक करतु है। याही कौ तौ भाव याकौ भूत प्रेत होइ लागौ, याही कौ तौ भाव याकी कुमति हरतु है॥
॥ आपने भाव को अंग ॥ [ १६३ याही कौ नौ भाव याकौ बापु कौ बघग करे, याही कौ तौ भाव याही चित्त के धग्तु है। याही कौ नौ भाव याही धार में बहाइ देत, सुंदर याही कौ भाव याही नै तरतु है ॥७॥ आपु ही कौ भाव मू तौ आपु ही प्रगट होत, आपु ही आरोप करि आपु मन नायौ है। देवी अन्य देव कोऊ भाव कौ उपासे ताहि, गर्त मैं तौ फन धन उनही ने पायौ है ॥ जैसे श्वान काच कौ बनाइ करि मागे गोद, आपु ही कौ मुख फेरि आप चार नायौ है। जैसे ही गदह चर आप ही भैंसान चढ़ि, मापन पछान करि और कौ नवायौ है ॥६॥ दृष्टांत तीर्थ नै तीरथ रूप नै रूपहि, पाने नै पाये हैं पीत न पीतौ । हरि नै हरि ब्यापि नै व्यापेहि, ध्याता नै ध्याया है ध्यौत न ध्यौतौ ॥ चर्चित चर्चित चीन्हि अतीत, भीतर भीतर है कौ नहीं । भीतर ही अपनो रूप नै रूपह, पावै तौ पावै जो दीठि सुदीठौ ॥७॥
१६४ ] ॥ सुन्दर विलास ॥ आपने भाव तै सूर सौ दीसत, आपुनै भाव तै चंद्र सौ भासैं। आपुनै भाव तैं तार अनत जु, आपुनै भाव तैं वीजु उजासै ॥ आपुनै भाव तैं नूर है तेज है, आपुनै भाव तै जोति प्रकासै। तैसौ ही ताहि दिखावत सुदर, जैसो ही होत है जाहि कौ आसै ॥८॥ आपुनै भाव तै सेवक साहिब, आपुनै भाव सबै कोऊ ध्यावै। आपुनै भाव तै अन्य उपासत, आपुनै भाव तै भक्त हू गावै ॥ आपुनै भाव तै दुष्ट सहारत, आपनै भाव तै वाहिर आवै। जैसौ हि आपुनौ भाव है सुदर, ताहि कौ तैसौ हि होइ दिखावै ॥६॥ आपुनै भाव तै दूर वतावत, आपुनै भाव नजीक वखान्यो। आपुनै भाव तै दूध पिवायौ जु, आपनै भाव तै वीठल जान्यौ ॥
॥ आपने भाव को अंग ॥ [ १६५ आपने भावतैं चार भुजा पुनि, आपने भाव तै सीग भी मांन्यौ । सुंदर आपने भाव के कारन, आपु हि पूरन ब्रह्म पिछान्यौ ॥१०॥ आपने भाव तै होइ उदास जु, आपने भाव तै प्रेम सौं रोवै । आपने भाव मिल्याँ पुनि जानत, आपने भाव तैं अनचि जोवै ॥ आपने भाव रहै नित जागत, आपने भाव समाधि मैं सोवै । सुंदर जैसो ई भाव है आपनो, तैसोइ आपु तहा तहाँ होवै ॥११॥ आपने भाव तै भूलि पर्यो भ्रम, देह स्वरूप भयौ अभिमानी । आपने भाव तै चंचलता धरि, आपने भाव तैं बुद्धि धिगानी ॥ आपने भाव तैं आप विसारत, आपने भाव तैं आत्म ज्ञानी । सुंदर जैसो हि भाव है आपनो, तैसो हि होइ रह्यौ यह प्रानी ॥१२॥ । इति आपने भाव को अंग समाप्त ॥
१६६ ]· ॥ सुन्दर विलास ॥ अथ स्वरूपबिसमरण को अंग ॥२४॥ इन्दव छंद जा घट की उनहार है जैसी हि, ताघट चेतन तैसौ हि दीसै । हाथी की देह मैं हाथी सौ मांनत, चीटी की देह मैं चीटी कीरो सै ॥ सिंह की देह मैं सिंह सौ मांनत, कीश की देह मैं मानत कीशै । जैसी उपाधि भई जहा सुदर, तैसौ हि होइ रह्यौ नखशीशै ॥१॥ जैसे हि पावक काठ के योग ते, काठ सौ होइ रह्यौ इक ठौरा । दीरघ काठ मै दीरघ लागत, चौरस काठ मैं लागत चौरा ॥ आपनौ रूप प्रकास करै जब, जारि करै तब औरको औरा । तैसे हि सुदर चेतन आप सु, आपकौ नाहि न जानत बौरा ॥२॥ (१) घट-शरीर । उनहार-आकृति। चेहरा । कीश-बदरा (२) पावक-अग्नि । बौरा-पागल ।
॥ स्वपदविस्मरण को अंग ॥ [ १६७ मनहर छन्द अजर अमर अद्विजन्म अविनाशी अज, कहत सकल जन श्रुति अबगाहे ते । निर्गुन निर्मल अति शुद्ध निरवध नित, ऐसाऊ कहत और अथनि के बाहे ते ॥ व्यापक अखण्ड एक रस परिपूरन है, सुन्दर सकल नभि स्यों ब्रह्म नाहे ते । सहज सदा उद्योत याही पै अचभा होत, आप ही को आप भूलि गयो सु तौ काहे ते ॥३॥ जैसे मीन मांस कौं निगल जात लोभ लागि, लोह कौ कटक नही जानत उमाहे ते । जैसे कपि'गागरि मैं मूंठि बांधि राखे शठ, छाडि नहिं देत सु तौ स्वाद ही के वाहे ते । जैसे शुक नलगियर चंच मारि लटकत, सुन्दर गहत दुख देख याहि लाहे ते । देह कौ संजोग पाइ इंद्रिनि के वसि पर्यो, आपुही कौं आप भूलि गयो सुख चाहे ते ॥४॥ (३) अज-अजन्मा। श्रुति-वेद । निरवध-वधनरहित । उद्योत-प्रकाशमान । एकरस-सदा इकसार रहने वाला । (४) कटक-काटा। मीन-मछली गागरि-घड़ा ।
१६८ ] ॥ सुन्दर विलास ॥ इन्दव छंद ज्यौ कोऊ मद्य पीयै अति छाकत, नाहिं कछू सुधि है भ्रम ऐसो ५ ज्यौ कोऊ खाड रहै ठग मूरि हि, जानै नहीं कछू कारन तैसो ॥ ज्यौं कोऊ बालक शंक उपावत, कंपि उठै अरु मानत भै सौ । तैसे हि सुन्दर आपकौं भूलि सु, देखहु चेतनि मानत कसौ ॥५॥ ज्यां कोऊ कूप मैं झाकि अलापत, वसीही भांति सु कूप अलापै । ज्यौ जल हालत है लगि पौन, कहै भ्रमतैं प्रतिबिव हि कांपै ॥ देह के प्रान के जे मन के कृत, मानत है सब मोहि की व्यापै । सुन्दर पेंच पर्यो अतिशै करि, भूलि गयौ भ्रम तैं भ्रम आपै ॥६॥ (५) मद्य-शराब । (६) अतिशै-बहुत । (३) महातम-अपनो महिमा, बडप्पन ।
॥ स्वरूपविस्मरण को अंग ॥ [ १६६ ज्यों द्विज कोऊक छाडि महातम, शूद्र भयो करि आपुनो मान्यो । ज्यों कोऊ भूपति सोवन सेज सु, रंक भयो सुपने महि जान्यो ॥ ज्यों कोऊ रूप की राजि अतित, कुरूप कहै भ्रम भैचक आन्यो । तैसेहि सुन्दर देह सो व्है करि, या भ्रम आपुहि आप भुलान्यो ॥७॥ एकहि व्यापक वस्तु निरतर, विश्व नही यह ब्रह्म विलासं । ज्यों नट मथनि सो दृग बांधत, है कछु औरमु औरई भासै ॥ ज्यों रजनी मंहि सूझि परै नहि, जो लगि सूरज नाहि प्रकासै । त्यों यह आपहि आप न जानत, सुन्दर व्है रह्यो सुन्दरदासै ॥८॥ मनहर छन्द इद्रिनि को प्रेरि पुनि इद्रिनि कें पोछे पर्यो, आपुनि अविद्या करि आप तनु गह्यो है। जोई जोई देह कौ सकट कछु परै आइ, सोई सोई मानै आप यातै दुख सह्यो है॥
१७० ] ।। सुन्दर विलास ।। भ्रमत भ्रमत कहू भ्रम कौ न आवै अंत, चिरकाल बोत्यौ पै स्वरूप कौ न लह्यौ है । सुन्दर कहत देखौ भ्रम की प्रबलताई, भूतनि मैं भूत मिलि भूत सौ व्है रह्यौ है ॥६॥ जैसे शुक नलिका न छाडि देत चगुल तै, जाने काहू औरै मोहि बाधि लटकायौ है । जैसे कपि गुंजनि कौ ढेर करि मानै आगि, आगे धरि तापै कछू शीत न गमायौ है ॥ जैसे कोऊ दिसा भूलि जातहु तौ पूरब कौ, उलटि अपूठौ फेरि पच्छिम कौ आयौ है । तैसे ही सुन्दर सब आप ही कौ भ्रम भयौ, आपुही कौ भूलि करि आपु ही बधायौ है ॥१०॥ जैसे कोऊ कामिनी के हिये पर चूकै बाल, सुपने मैं कहै मेरौ पुत्र कांहू हर्यौ है । जैसे कोऊ पुरुष कै कंठ विषै हुति मनि, ढूंढत फिरत कछु ऐसौ भ्रम भयौ है । जैसे कोऊ वायु करि बावरौ वक़त डोलै, और की औरई कहै सुधि भूलि गयौ है । तैसे ही सुन्दर निज रूप कौ विसारि देत, ऐसौ भ्रम आपु ही कौ आपु करि लयौ है ॥११॥
॥ स्वरूपविस्मरण को अंग ॥ [ १७१ दीन हीन छीन सौ व्है जात छिन छिन माहि, देह के सजोग पराधीन सौ रहतु है। शीत लगे घाम लगे भूख लगे प्यास लगे, शोक मोह मानि अति खेद कौ लहतु है ॥ अध भयौ पगु भयौ मूक हौ वधिर भयौ, ऐसी मानि मानि भ्रम नदी मैं बहतु है । सुन्दर अधिक मोहि याही तैं अचंभौ आहि, भँलि कै स्वरूप कौ अनाथ सौ कहतु है ॥१२॥ जैसे कोऊ सुपिनै मैं कहै मैं तौ ऊंट भयौ, जागि करि देखै उहै मनुष स्वरूप है । जैसे कोऊ राजा पनि सोइकै भिखारी होई, आंखि उघरे तैं महाभूपति कौ भूप है ॥ जैसे कोऊ भ्रम ही तै कहै मेरौ सिर कहा, भ्रम के गये तै जानै सिर तौ तद्रूप है । तैसे हि सुन्दर यह भ्रम करि भूलौ आप, भ्रम कै गये तै यह आतमा अनूप है ॥१३॥ जैसे कोऊ पोसती की पाग परी भूमि पर, हाथ लै कै कहै मैं तो पाग एक पाई है । जैसे सेखचिली हू मनोरथनि कीयौ घर, कहै मेरौ घर गयौ गागरि गिराई है ॥
१७२ ] ॥ सुन्दर विलास ॥ जैसे काहू भूत लग्यौ बकत है आकबाक, सुधि सब दूरि भई औरै मति आई है। तैसे ही सुन्दर यह भ्रूम करि भूलौ आप, भ्रूम कै गये तै यह आतमा सदाई है ॥१४॥ आपु ही चेतन यह इद्रिनि चेतनि करि, आपु ही मगन होइ आनन्द बढायौ है। जैसे नर शीतकाल सोवत निहाली ओढि, आपु ही तपत करि आपु सुख पायौ है॥ जैसे बाल लकरी कौ घौरा करि डाकि चढै, आप असवारि होइ आप ही कुदायौ है। तैसे ही सुन्दर यह जड कौ सजोग पाइ, पर सुख आपु मानि, आपु ही-भुलायौ है ॥१५॥ कहू भूल्यौ कामरत, कहू भूल्यौ साधि जत, कहू भूल्यौ गृहि मधि, कहू वनबासी है। कहू भूल्यौ नोच जानि कहू भूल्यौ ऊच मानि, कहू भूल्यौ माह बाधि कहू तौ उदासी है ॥ कहू भूल्यौ मौन धरि कहू बकबाद करि, कहू भूल्यौ मक्कै जाइ कहू भूल्यौ कासी है। सुन्दर कहत अहकार ही तै भूल्यौ आप, एक आवै रोज अरु दूजै बडी हासी है ॥१६॥ (१५) निहाली-रजाई ।
॥ स्वरूप बिसमरण को अंग ॥ [ १७३ मैं बहुत सुख पायौ मैं बहुत दुख पायौ, मैं अनन्त पुन्य कीये मेरै पोतै पाप है। मैं कुलीन विद्या कौ पंडित परवीन महा, मैं तो मूढ अकुलीन हीन मेरै बाप है॥ मैं हौं राजा मेरी आन फिरै चहू चक माहि, मैं तो रंक द्रव्यहीन मोहि तौ संताप है। सुन्दर कहत अहंकार ही तै जीव भयौ, अहंकार गये यह एक ब्रह्म आप है ॥१७॥ देह ही सुपुष्ट लगै देह ही दूबरी लगै, देह ही कौ शीत लगै देह ही कौं तावरौ। देह ही कौ तीर लगै देह कौ तुपक लगै, देह कौ कृपान लगै देह ही कौं घावरौ॥ देह ही सुरूप लगै देह ही कुरूप लगै, देह ही जुवान लगै देह वृद्ध डावरौ। देह ही सौं वाधि हेत आपु विषै मानि लेत, सुन्दर कहत ऐसो बुद्धि हीन बावरौ ॥१८॥ द्वन्द्व छंद आपु हि चेतन ब्रह्म अखंडित, सो भ्रम तै कछु अन्य परेखै। ढूंढत ताहि फिरै जित ही तित, साधत जोग बनावत भेखै॥
१७४ ] ॥ सुन्दर विलास ॥ औरऊ कष्ट करै अतिशै करि, प्रत्यक आतम तत्त न पेखै । सुन्दर भूलि गयौ निज रूप ही, है कर ककन दर्पन देखै ॥१६॥ सूत्र गले महि मेलि भयौ द्विज, ब्राह्मन व्है कर ब्रह्म न जान्यौ । छत्रिय व्है करि छत्र धर्यौ सिर, है गय पैदल सी मन मान्यौ ॥ वैशि भयौ वपु की वय देखत, झूठ प्रपंच वनिज्ज हि ठान्यौ । शूद्र भयौ मिलि शूद्र शरीर ही, सुन्दर आपु नही पहिचान्यौ ॥२०॥ ज्यो रवि कौ रवि ढूंढत है कहु, तप्ति मिलै तनु शीत गवाऊ । ज्यौ शशिकौ शशि चाहत है पुनि, शीतल व्है करि तप्ति बुझाऊ । ज्यौ सनिपात भये नर टेरत, है घर मैं अपनै घर जाऊ । त्यौ यह सुन्दर भूलि स्वरूप ही, ब्रह्म कहै कब ब्रह्म हि पाऊ ॥२१॥
॥ स्वरूप बिसमरण को अंग ॥ [ १७५ आपु न देखत है अपनौ मुख, दर्पन काट लग्यौ अति थूला। ज्यौ दृग देखत तें रहि जात, भयौ जबही पुतरी परि फूला॥ छाइ अज्ञान रह्यो अभि अंतरि, जांनि सकै नहिं आतम मूला। सुन्दर यौ उपज्यो मन कै मल, ज्ञान बिना निजरूपहि भूला॥२२॥ दीन हुवौ बिललात फिरै नित, इंद्रिनि कै बस छीलक छोलै। सिंह नही अपनौ बल जानत, जबुक ज्यौ जितही तित डोलै॥ चेतनता बिसराइ निरतर, लै जडता भ्रम गाठि न खोलै। सुन्दर भूलि गयौ निज रूप हि, देह स्वरूप भयौ मुख बोलै॥२३॥ मै सुखिया सुख सेज सुखासन, है गय भूमि महा रजधानी। हौ दुखिया दिन रैनि भरौ दुख, मोहि विपत्ति परी नही छानी॥
१७६ ] ॥ सुन्दर विलास ॥ हौं अति उत्तम जाति बडौ कुल, हौं अति नीच क्रिया कुल हानी । सुन्दर चेतनता न सभारत, देह स्वरूप भयौ अभिमानी ॥२४॥ गर्भ बिषै उतपत्ति भई पुनि, जन्म लियौ शिशु बुद्धि न जानी । बाल कुमार किशोर जुवादिक, बृद्ध भये अति बुद्धि नसानी ॥ जैसी ही भाति भई बपु की गति, तैसौ ही होइ रह्यौ यहु प्रानी । सुन्दर चेतनता न सभारत, देह स्वरूप भयौ अभिमानी ॥२५॥ ज्यो कोऊ त्याग करै अपनौ घर, बाहर जाइ कै भेष बनावै । मूं ड मुडाइ कै कान फराइ, बिभूति लगाइ जटाऊ बधावै ॥ जैसौई स्वाग करै बपु कौ पुनि, तैसौई मानि तिसौ व्है जावै । त्यौ यह सुन्दर आपुन जानत, भूलि स्वरूप हि और कहावै ॥२६ । ॥ इति स्वरूप बिस्मरणको अंग सम्पूर्ण ॥
॥ सांख्य ज्ञांन को अंग ॥ [ १७७ अथ सांख्य ज्ञांन को अंग ॥२५॥ मनहर छंद क्षिति जल पावक पवन नभ मिलि करि, शबद रु सपरस रूप रस गंध जू । श्रोत्र त्वक चक्षु घ्रान रसना रस कौ ज्ञान, वाक् पानि पाद पायु उपस्थ हि बध जू ॥ मन बुद्धि चित अहकार ये चौबीस तत, पचंबिश जीव तत करत है धध जू । षड विश कौ है ब्रह्म सुन्दर सु निहकर्म, व्यापक अखंड एक रस निरसध जू । १॥ श्रोत्र दिक् त्वक् वायु लोचन प्रकाश रवि, नासिका अश्वनी जिव्हा बरुन बखानिये । वाक अग्नि हस्त इन्द्र चरन उपेन्द्र बल, मेढ प्रजापति गुदा मित्र हू कौ ठानिये ॥ मन चन्द्र बुद्धि बिधि चित बासुदेव श्राहि, अहकार रुद्र कौ प्रभाव करि मानिये । (१) क्षिति-पृथ्वी । पावक-तेज. अग्नि । पवन-वायु । नभ-आकाश । वाक्-वाणी । पानि-हाथ । पाद-पैर । पायु-मलेन्द्रिय । उपस्थ-मूत्रेन्द्रिय । पचविंश-पचीसवा । षड्विंश-छब्बीसवा । निहकर्म-निष्कर्म । निरसध-संधि रहित-निरवयव ।
१७८ ] ॥ सुन्दर विलास ॥ जाकी सत्ता पाइ सब देवता प्रकाशत है, सुन्दर सु आतमा हि न्यारौ करि जानिये ॥२॥ इन्दव छन्द श्रोत्र सुनै दृग देखत हैं, रसना रस घ्रान सुगंध पियारौ । कोमलता त्वक् जानत है पुनि, बोलत है मुख शब्द उचारौ ॥ पानि ग्रहै पद गौन करै, मल मूत्र तजै उभऊ अध द्वारौ । जाके प्रकाश प्रकाशत हैं सब, सुन्दर सोई रहै घट न्यारौ ॥३॥ बुद्धि भ्रमै मन चित्त भ्रमै, अहंकार भ्रमै कहा जांनत नांही । श्रोत्र भ्रमै त्वक् घ्रान भ्रमै, रसना दृग देखि दसौ दिसि जाही ॥ वाक् भ्रमै कर पाद भ्रमै, गुदद्वार उपस्थ भ्रमै कँहु काही । तेरे भ्रमाये भ्रमै सबही गुन, सुन्दर तू क्यौ भ्रमै इन 'माहीं ॥४॥ (२) उपेन्द्र-विष्णु। मेढ-मेढ्र, उपस्थ। प्रजापति-ब्रह्मा । विधि-ब्रह्मा। वासुदेव-विष्णु । रुद्र-शंकर ।
॥ सांख्य ज्ञान को अंग ॥ [ १७६ बुद्धि कौ बुद्धि रु चित्तकौ चित्त, अह कौ ग्रह मन कौ मन वोई । नैन कौ नैन है बैन कौ बैन है, कान कौ कान त्वचा त्वक् होई ।1 घ्रान कौ घ्रान है जीभ कौ जीभ है, हाथ कौ हाथ पगौ पग दोई । शीश कौ शीश है प्रान कौ प्रांन है, जीव कौ जीवहै सुन्दर सोई ॥५॥ मनहर छंद (प्रश्न) कसै कै जगत यह रच्यौ है जगतगुरु, मौ सौ कहौ प्रथम ही कौन तत्व कीनौ है । प्रकृति कि पुरुष कि महत्तत अहकार, किधौ उपजाये सत रज तम तीनौ है ।1 किधौ व्योम वायु तेज आप कै अवनि कीन, किधौ पंच विषय पसारि करि लीनौ है । किधौ दस इन्द्री किधौं अन्तहकरन कीन, सुन्दर कहंत किधौं सकल विहीनौ है ॥६॥ उत्तर ब्रह्म तै पुरुष अरु प्रकृति प्रगट भई, प्रकृति तै महत्तत्त पुनि अहंकार है । अहकार हू तै तीन गुन सत रज तम, तम हू तै महाभूत विषय पसार है ।1
१८० ] ।। सुन्दर विलास ।। रज हूं तैं इन्द्रिय दस पृथक पृथक भई, सत हूं तैं मन आदि देवता विचार है । ऐसे अनुक्रम करि सिष्य सौं कहत गुरु, सुन्दर सकल यह मिथ्या भ्रम जार है ॥७॥ प्रश्न ? मेरौ रूप भूमि है कि मेरौ रूप आप है कि, मेरौ रूप तेज है कि मेरौ रूप पौन है ? मेरौ रूप व्योम है कि मेरौ रूप इन्द्रिय है कि, अन्त करन है कि बैठौ है कि गौन है ॥ मेरौ रूप त्रिगुन कि अहकार महत्तत्त, प्रकृति पुरुष किधौ बोले है कि मौन है । मेरौ रूप थूल है कि सुनि आदि मेरौ रूप, सुन्दर पूछत गुरु मेरौ रूप कौन है ॥८॥ उत्तर तूं तौ कछु भूमि नाहि आप तेज वायु नांहि, व्योम पच विषै नाहि सौ तौ भ्रम कूप है । तू तो कछु इन्द्रिय अरु अन्तहकरन नाहि, तीनौ गुनहू तू नाहि सोऊ छाह धूप है ॥ तूं तौ अहकार नाहि पुनि महत्तत्त नाहिं, प्रकृति पुरुष नाहि तू तौ सु अनूप है । (८) आप-जल । पौन-पवन, वायु । व्योम-आकाश । गौन-गमन ।