सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)
Sundar Vilas of Sant Sundardas with Hindi Commentary
सन्त सुन्दरदास जी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१६२ ] ॥ सुन्दर विलास ॥ नीच ऊंच बुरौ भलौ सुजन दुर्जन पुनि, - पंडित मूरख शत्रु मित्र रक राव है। मान अपमान पुन्य पाप सुख दुख दोऊ, स्वरग नरक बध मोक्ष हू कौ चाव है॥ देवता असुर भूत प्रेत कीट कुंजर ऊ, पशु अरु पंखी श्वान शूकर बिलाव है। सुंदर कहत यह एकई अनेक रूप, जोई कछु देखिये सु आपुनौ ई भाव है ॥३॥ याहीकै जागत काम याहीकें जागत क्रोध, याही कै जागत लोभ याही मोह मातौ है। याकौ याही बैरी होत याकौ याही मित्र होत, याकौ याही सुख देत याही दुख दातौ है॥ याही ब्रह्मा याही रुद्र याही विष्णु देखियत, याही देव दैत्य यक्ष सकल संघाती है। याही कौ प्रभाव सु तौ याही कौं दिखाई देत, सुंदर कहत याही आत्मा विख्यातौ है ॥४॥ याही कौ तौ भाव याकौ शक उपजावत है, याही कौ तौ भाव याही निशक करतु है। याही कौ तौ भाव याकौ भूत प्रेत होइ लागौ, याही कौ तौ भाव याकी कुमति हरतु है॥