सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)
Sundar Vilas of Sant Sundardas with Hindi Commentary
सन्त सुन्दरदास जी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें॥ आपने भाव को अंग ॥ [ १६३ याही कौ नौ भाव याकौ बापु कौ बघग करे, याही कौ तौ भाव याही चित्त के धग्तु है। याही कौ नौ भाव याही धार में बहाइ देत, सुंदर याही कौ भाव याही नै तरतु है ॥७॥ आपु ही कौ भाव मू तौ आपु ही प्रगट होत, आपु ही आरोप करि आपु मन नायौ है। देवी अन्य देव कोऊ भाव कौ उपासे ताहि, गर्त मैं तौ फन धन उनही ने पायौ है ॥ जैसे श्वान काच कौ बनाइ करि मागे गोद, आपु ही कौ मुख फेरि आप चार नायौ है। जैसे ही गदह चर आप ही भैंसान चढ़ि, मापन पछान करि और कौ नवायौ है ॥६॥ दृष्टांत तीर्थ नै तीरथ रूप नै रूपहि, पाने नै पाये हैं पीत न पीतौ । हरि नै हरि ब्यापि नै व्यापेहि, ध्याता नै ध्याया है ध्यौत न ध्यौतौ ॥ चर्चित चर्चित चीन्हि अतीत, भीतर भीतर है कौ नहीं । भीतर ही अपनो रूप नै रूपह, पावै तौ पावै जो दीठि सुदीठौ ॥७॥