सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)

सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)
Sundar Vilas of Sant Sundardas with Hindi Commentary
सन्त सुन्दरदास जी द्वारा
DevanagariHindipublished284 पृष्ठ
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॥ स्वरूपविस्मरण को अंग ॥ [ १६६ ज्यों द्विज कोऊक छाडि महातम, शूद्र भयो करि आपुनो मान्यो । ज्यों कोऊ भूपति सोवन सेज सु, रंक भयो सुपने महि जान्यो ॥ ज्यों कोऊ रूप की राजि अतित, कुरूप कहै भ्रम भैचक आन्यो । तैसेहि सुन्दर देह सो व्है करि, या भ्रम आपुहि आप भुलान्यो ॥७॥ एकहि व्यापक वस्तु निरतर, विश्व नही यह ब्रह्म विलासं । ज्यों नट मथनि सो दृग बांधत, है कछु औरमु औरई भासै ॥ ज्यों रजनी मंहि सूझि परै नहि, जो लगि सूरज नाहि प्रकासै । त्यों यह आपहि आप न जानत, सुन्दर व्है रह्यो सुन्दरदासै ॥८॥ मनहर छन्द इद्रिनि को प्रेरि पुनि इद्रिनि कें पोछे पर्यो, आपुनि अविद्या करि आप तनु गह्यो है। जोई जोई देह कौ सकट कछु परै आइ, सोई सोई मानै आप यातै दुख सह्यो है॥