सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)
Sundar Vilas of Sant Sundardas with Hindi Commentary
सन्त सुन्दरदास जी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१७० ] ।। सुन्दर विलास ।। भ्रमत भ्रमत कहू भ्रम कौ न आवै अंत, चिरकाल बोत्यौ पै स्वरूप कौ न लह्यौ है । सुन्दर कहत देखौ भ्रम की प्रबलताई, भूतनि मैं भूत मिलि भूत सौ व्है रह्यौ है ॥६॥ जैसे शुक नलिका न छाडि देत चगुल तै, जाने काहू औरै मोहि बाधि लटकायौ है । जैसे कपि गुंजनि कौ ढेर करि मानै आगि, आगे धरि तापै कछू शीत न गमायौ है ॥ जैसे कोऊ दिसा भूलि जातहु तौ पूरब कौ, उलटि अपूठौ फेरि पच्छिम कौ आयौ है । तैसे ही सुन्दर सब आप ही कौ भ्रम भयौ, आपुही कौ भूलि करि आपु ही बधायौ है ॥१०॥ जैसे कोऊ कामिनी के हिये पर चूकै बाल, सुपने मैं कहै मेरौ पुत्र कांहू हर्यौ है । जैसे कोऊ पुरुष कै कंठ विषै हुति मनि, ढूंढत फिरत कछु ऐसौ भ्रम भयौ है । जैसे कोऊ वायु करि बावरौ वक़त डोलै, और की औरई कहै सुधि भूलि गयौ है । तैसे ही सुन्दर निज रूप कौ विसारि देत, ऐसौ भ्रम आपु ही कौ आपु करि लयौ है ॥११॥