भारतकोश
सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)

सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)

Sundar Vilas of Sant Sundardas with Hindi Commentary

सन्त सुन्दरदास जी द्वारा

DevanagariHindipublished284 पृष्ठ

पृष्ठ 180, कुल 284 में से

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पृष्ठ 180

॥ स्वरूपविस्मरण को अंग ॥ [ १७१ दीन हीन छीन सौ व्है जात छिन छिन माहि, देह के सजोग पराधीन सौ रहतु है। शीत लगे घाम लगे भूख लगे प्यास लगे, शोक मोह मानि अति खेद कौ लहतु है ॥ अध भयौ पगु भयौ मूक हौ वधिर भयौ, ऐसी मानि मानि भ्रम नदी मैं बहतु है । सुन्दर अधिक मोहि याही तैं अचंभौ आहि, भँलि कै स्वरूप कौ अनाथ सौ कहतु है ॥१२॥ जैसे कोऊ सुपिनै मैं कहै मैं तौ ऊंट भयौ, जागि करि देखै उहै मनुष स्वरूप है । जैसे कोऊ राजा पनि सोइकै भिखारी होई, आंखि उघरे तैं महाभूपति कौ भूप है ॥ जैसे कोऊ भ्रम ही तै कहै मेरौ सिर कहा, भ्रम के गये तै जानै सिर तौ तद्रूप है । तैसे हि सुन्दर यह भ्रम करि भूलौ आप, भ्रम कै गये तै यह आतमा अनूप है ॥१३॥ जैसे कोऊ पोसती की पाग परी भूमि पर, हाथ लै कै कहै मैं तो पाग एक पाई है । जैसे सेखचिली हू मनोरथनि कीयौ घर, कहै मेरौ घर गयौ गागरि गिराई है ॥

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