सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)

सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)
Sundar Vilas of Sant Sundardas with Hindi Commentary
सन्त सुन्दरदास जी द्वारा
DevanagariHindipublished284 पृष्ठ
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१६८ ] ॥ सुन्दर विलास ॥ इन्दव छंद ज्यौ कोऊ मद्य पीयै अति छाकत, नाहिं कछू सुधि है भ्रम ऐसो ५ ज्यौ कोऊ खाड रहै ठग मूरि हि, जानै नहीं कछू कारन तैसो ॥ ज्यौं कोऊ बालक शंक उपावत, कंपि उठै अरु मानत भै सौ । तैसे हि सुन्दर आपकौं भूलि सु, देखहु चेतनि मानत कसौ ॥५॥ ज्यां कोऊ कूप मैं झाकि अलापत, वसीही भांति सु कूप अलापै । ज्यौ जल हालत है लगि पौन, कहै भ्रमतैं प्रतिबिव हि कांपै ॥ देह के प्रान के जे मन के कृत, मानत है सब मोहि की व्यापै । सुन्दर पेंच पर्यो अतिशै करि, भूलि गयौ भ्रम तैं भ्रम आपै ॥६॥ (५) मद्य-शराब । (६) अतिशै-बहुत । (३) महातम-अपनो महिमा, बडप्पन ।