भारतकोश
सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)

सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)

Sundar Vilas of Sant Sundardas with Hindi Commentary

सन्त सुन्दरदास जी द्वारा

DevanagariHindipublished284 पृष्ठ

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पृष्ठ 176

॥ स्वपदविस्मरण को अंग ॥ [ १६७ मनहर छन्द अजर अमर अद्विजन्म अविनाशी अज, कहत सकल जन श्रुति अबगाहे ते । निर्गुन निर्मल अति शुद्ध निरवध नित, ऐसाऊ कहत और अथनि के बाहे ते ॥ व्यापक अखण्ड एक रस परिपूरन है, सुन्दर सकल नभि स्यों ब्रह्म नाहे ते । सहज सदा उद्योत याही पै अचभा होत, आप ही को आप भूलि गयो सु तौ काहे ते ॥३॥ जैसे मीन मांस कौं निगल जात लोभ लागि, लोह कौ कटक नही जानत उमाहे ते । जैसे कपि'गागरि मैं मूंठि बांधि राखे शठ, छाडि नहिं देत सु तौ स्वाद ही के वाहे ते । जैसे शुक नलगियर चंच मारि लटकत, सुन्दर गहत दुख देख याहि लाहे ते । देह कौ संजोग पाइ इंद्रिनि के वसि पर्यो, आपुही कौं आप भूलि गयो सुख चाहे ते ॥४॥ (३) अज-अजन्मा। श्रुति-वेद । निरवध-वधनरहित । उद्योत-प्रकाशमान । एकरस-सदा इकसार रहने वाला । (४) कटक-काटा। मीन-मछली गागरि-घड़ा ।