सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)

सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)
Sundar Vilas of Sant Sundardas with Hindi Commentary
सन्त सुन्दरदास जी द्वारा
DevanagariHindipublished284 पृष्ठ
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१६६ ]· ॥ सुन्दर विलास ॥ अथ स्वरूपबिसमरण को अंग ॥२४॥ इन्दव छंद जा घट की उनहार है जैसी हि, ताघट चेतन तैसौ हि दीसै । हाथी की देह मैं हाथी सौ मांनत, चीटी की देह मैं चीटी कीरो सै ॥ सिंह की देह मैं सिंह सौ मांनत, कीश की देह मैं मानत कीशै । जैसी उपाधि भई जहा सुदर, तैसौ हि होइ रह्यौ नखशीशै ॥१॥ जैसे हि पावक काठ के योग ते, काठ सौ होइ रह्यौ इक ठौरा । दीरघ काठ मै दीरघ लागत, चौरस काठ मैं लागत चौरा ॥ आपनौ रूप प्रकास करै जब, जारि करै तब औरको औरा । तैसे हि सुदर चेतन आप सु, आपकौ नाहि न जानत बौरा ॥२॥ (१) घट-शरीर । उनहार-आकृति। चेहरा । कीश-बदरा (२) पावक-अग्नि । बौरा-पागल ।