भारतकोश
सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)

सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)

Sundar Vilas of Sant Sundardas with Hindi Commentary

सन्त सुन्दरदास जी द्वारा

DevanagariHindipublished284 पृष्ठ

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पृष्ठ 174

॥ आपने भाव को अंग ॥ [ १६५ आपने भावतैं चार भुजा पुनि, आपने भाव तै सीग भी मांन्यौ । सुंदर आपने भाव के कारन, आपु हि पूरन ब्रह्म पिछान्यौ ॥१०॥ आपने भाव तै होइ उदास जु, आपने भाव तै प्रेम सौं रोवै । आपने भाव मिल्याँ पुनि जानत, आपने भाव तैं अनचि जोवै ॥ आपने भाव रहै नित जागत, आपने भाव समाधि मैं सोवै । सुंदर जैसो ई भाव है आपनो, तैसोइ आपु तहा तहाँ होवै ॥११॥ आपने भाव तै भूलि पर्यो भ्रम, देह स्वरूप भयौ अभिमानी । आपने भाव तै चंचलता धरि, आपने भाव तैं बुद्धि धिगानी ॥ आपने भाव तैं आप विसारत, आपने भाव तैं आत्म ज्ञानी । सुंदर जैसो हि भाव है आपनो, तैसो हि होइ रह्यौ यह प्रानी ॥१२॥ । इति आपने भाव को अंग समाप्त ॥