भारतकोश
सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)

सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)

Sundar Vilas of Sant Sundardas with Hindi Commentary

सन्त सुन्दरदास जी द्वारा

DevanagariHindipublished284 पृष्ठ

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पृष्ठ 182

॥ स्वरूप बिसमरण को अंग ॥ [ १७३ मैं बहुत सुख पायौ मैं बहुत दुख पायौ, मैं अनन्त पुन्य कीये मेरै पोतै पाप है। मैं कुलीन विद्या कौ पंडित परवीन महा, मैं तो मूढ अकुलीन हीन मेरै बाप है॥ मैं हौं राजा मेरी आन फिरै चहू चक माहि, मैं तो रंक द्रव्यहीन मोहि तौ संताप है। सुन्दर कहत अहंकार ही तै जीव भयौ, अहंकार गये यह एक ब्रह्म आप है ॥१७॥ देह ही सुपुष्ट लगै देह ही दूबरी लगै, देह ही कौ शीत लगै देह ही कौं तावरौ। देह ही कौ तीर लगै देह कौ तुपक लगै, देह कौ कृपान लगै देह ही कौं घावरौ॥ देह ही सुरूप लगै देह ही कुरूप लगै, देह ही जुवान लगै देह वृद्ध डावरौ। देह ही सौं वाधि हेत आपु विषै मानि लेत, सुन्दर कहत ऐसो बुद्धि हीन बावरौ ॥१८॥ द्वन्द्व छंद आपु हि चेतन ब्रह्म अखंडित, सो भ्रम तै कछु अन्य परेखै। ढूंढत ताहि फिरै जित ही तित, साधत जोग बनावत भेखै॥