भारतकोश
सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)

सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)

Sundar Vilas of Sant Sundardas with Hindi Commentary

सन्त सुन्दरदास जी द्वारा

DevanagariHindipublished284 पृष्ठ

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॥ विचार को अंग ॥ [ २०३ जती तूं कहावै तो तू एक या जनन करि, याही जत नीकौ यह आतमा कों हेरिये । तपसी कहावै तौ तू एक याही तप गाढ़ि, याही तप नीकौ मन इन्द्रीन की घेरिये ॥ भक्त तूं कहावै तौ तू चित्त एक ठौर आनि, श्वासे श्वास सोहं जाप याही माला फेरिये । सं मी कहावै तो तूं एक या संयम करि, सुन्दर कहत देह आतमा निवेरिये । २३॥ ब्राह्मन कहावै तौ तूं ब्रह्म कौ विचार कर, सत्त रज तम तीनो ताग तोरि डारिये । पंडित कहावै तौ तू याही एक पाठ पढ़ि, अंत वेद मैं कह्यौ जू ताहि कौ विचारिये ॥ ज्यौतिषी कहावै तो तू ज्योति कौ प्रकाश कर, अंतहकरन अंधकार कौ निवारिये । आगमी कहावै तौ तू अगम ठौर कौ जानि, सुन्दर कहत याही अनुभव धारिये ॥२४॥ ब्राह्मन कहावं तौ तू आपुही कौं ब्रह्म जानि, अति ही पवित्र सुख सागर मैं न्हाइये । क्षत्री तू कहावै तौ तू प्रजा प्रतिपाल कर, शीश पर एक ज्ञान छत्र कौ फिराइये ॥