सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)
Sundar Vilas of Sant Sundardas with Hindi Commentary
सन्त सुन्दरदास जी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२०४ ] ॥ सुन्दर विलास ॥ वैश्य तू कहावै तौ तू एक ही व्यापार जानि, आतमा कौ लाभ सोई अनायास पाइये । शूद्र तू कहावै तौ तू शूद्र देह त्याग कर, सुन्दर कहत निज रूप मैं समाइये ॥५५॥ ब्रह्मचारी होइ तो तू वेद को बिचार देखि, ताहि कौ समुझि जोई कह्यौ वेद श्रत है। गृही तू कहावै तौ तू सुमति त्रिया कौ व्याहि, जाकै ज्ञान पुत्र होइ ऊही भाग्यवत है ॥ वानप्रस्थ होइ तौ तू काया वनवास करि, कर्म कद मूल खाहि फल हू अनन्त है। सन्यासी कहावै तौ तू तीनो लोक न्यास करि, सुन्दर परमहंस होइ या सिधत है । २६॥ रामानदी होइ तौ तू तुच्छानन्द त्याग करि, राम नाम भज रामानन्द ही कौ ध्याइये । निंबाद्वैती होइ तौ तू कामना कटुक त्याग, अमृत कौ पान कर अधिक अघाइये ॥ मध्वाचारी है तौ तू मधुर कौ बिचार, मधुर मधुर धुनि हृदै मधि गाइये । विष्णु स्वामी होइ तौ तू व्यापक बिष्णु कौ जान, सुन्दर बिष्णु कौ भजि बिष्णु मैं समाइये ॥२७॥