सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)
Sur Sagar Saar with Hindi Commentary
महाकवि सूरदास / डॉ. धीरेन्द्र वर्मा द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें८८ सूरसागर सार सटीक से ही कल्याण होगा । इस प्रकार भलीभांति कहकर समझाना । इसे हृदय की बात जानने वाले कृष्ण जान गये । (वे) स्वयं (ब्रज मे) रुके रहे और ग्वालो को वन मे भेज दिया । सूरदास कहते हैं ब्रज को सुख देने वाले, कंस के काल कृष्ण अत्यन्त प्रसन्न हुए ॥२०॥ पाती वाँचत नंद डराने । कालीदह के फूल पठावहु, सुनि सबही घवराने । जो मोकौं नहिं फूल पठावहु, तौ ब्रज देहुँ उजारि । महर, गोप, उपनंद न राखौं, सबहिनि डारौँ मारि । पुहुप देहु तौ बनै तुम्हारी, ना तरु गए विलाइ । सूर स्याम बलरामु तिहारे, मांगीं उनहिं धराइ ॥२१॥ अर्थ—पत्र पढते ही नन्द डर गये । 'कालीदह के फूल को भेजो' इसे सुनकर सब लोग घबडा उठे । यदि मुझे फूल नही भेजते हो तो ब्रज को उजाड़ दूँगा । महर (नंद) गोप, उपनंद (नंद के छोटे भाई) किसी को नही रहने दूँगा और सबको मार डालूंगा । यदि फूल दो तो तुम्हारा कल्याण हो सकता है नही तो नष्ट हो जाओगे । तुम्हारे कृष्ण तथा बलराम (दो पुत्र) है उन्ही से मंगा लो ॥२१॥ पूछौ जाइ तात सौं बात । मैं बलि जाउँ मुखारविंद की, तुमहीं काज कंस अकुलात । आए स्याम नंद पै धाए, जान्यौ मातु-पिता बिलखात । अबहीं दूर करौँ दुख इनको, कंसहिं पठै देउँ जलजात । मोसौँ कहो बात बाबा यह, वहुत करत तुम सोच विचार । कहा कहौं तुमसौँ मैं प्यारे, कंस करत तुमसौँ कछु झार । जब तैं जनम भयौ है तुम्हरी, कैते करबर टरे कन्हाइ । सूर स्याम कुलदेवनि तुमकौं जहाँ तहाँ करि लियौ सहाइ ॥२२॥ अर्थ-यशोदा कृष्ण से कह रही हैं कि पिता जी के पास जाकर इस बात को पूछो तुम्हारे कमल मुख पर वलिहारी जाती हूँ, तथा (हे पुत्र) तुम्हारे लिए (तुम्हारे कारण) कंस व्याकुल है । श्याम नंद के पासे दौडे हुए आए और माता-पिता को बिल- खते हुए देखा । (कृष्ण ने सोचा) अभी कंस के पास कमल भेजकर इनके दुख को दूर कर दूँगा । (फिर उन्होंने नंद से कहा) हे बाबा मुझसे (उस) बात को कहो जिसके लिए तुम बहुत सोच विचार कर रहे हो । (नंद ने कहा) हे प्यारे तुमसे क्या कहूँ, कंस तुमसे कुछ वैर करता है । जब से तुम्हारा जन्म हुआ तब से (तुम्हारा अनिष्ट करने के लिए किये गये) कितने यत्न टल गये । कुल के देवताओ ने जहाँ तहाँ तुम्हारी सहायता कर दी ॥२२॥ खेलत स्याम, सखा लिए सग । इक मारत, इक रोवत गेंदहिं, इक भागत करि नाना रंग । मार परसपर करत आपु मैं, अति आनंद भए मन माहिं । खेलत ही मैं स्याम सबनि कौं, जमुना तट कौं लीन्हें जाहिं ।