भारतकोश
सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)

सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)

Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary

भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा

DevanagariHindipublished838 पृष्ठ

पृष्ठ 106, कुल 838 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 106

स्पष्टाधिकार ८३

विशेष शक्ति रखते हैं और अदृश्य भी हैं; इसलिए इनको विशेष शक्तिमान समझने के कारण अदृश्य देवमूर्तियाँ कहा गया है जो अदृश्य वायु रूपी रस्सी से ग्रहों को अपनी ओर खींचे रहते हैं और इनको प्रवह नामक वायु भी सहायता पहुँचाती है । पात के बारे में पहले लिखा जा चुका है। वहाँ चन्द्रमा के पात के सम्बन्ध में जो कुछ लिखा गया है वही अन्य ग्रहों के पातों के लिए भी लागू है । जब ग्रह उत्तर पात पर आता है तब क्रान्ति वृत्ति पर देख पड़ता है । जब यहाँ से आगे बढ़ता है तब क्रान्तिवृत्ति से उत्तर हो जाता है। जब तक वह दक्खिन पात पर अर्थात् उत्तर पात से १८०° आगे नहीं पहुँच जाता तब तक क्रान्तिवृत्त से उत्तर ही रहता है । ऐसी दशा में उत्तर पात ग्रह से पच्छिम रहता है । इसीलिए आगे के ७वें श्लोक में यह बतलाया गया है कि ग्रह से १८०° तक पच्छिम में स्थित पात (उत्तर पात) ग्रह को उत्तर की ओर ढकेलता है और १८०° तक पूर्व में स्थिति पात उसको दक्खिन की ओर ढकेलता है । यह भी अदृश्य है और क्रान्ति वृत्त से ग्रह को उत्तर या दक्खिन की ओर ढकेलते हुए जान पड़ता है । इसलिए इसमें भी दैवीशक्ति मानी गयी है । परन्तु यथार्थ कारण यह है कि सूर्य और ग्रहों की कक्षाएं एक ही तल में नहीं हैं, जिससे प्रत्येक ग्रह की कक्षा सूर्य की कक्षा को दो विन्दुओं पर काटती हुई जान पड़ती है । आगे के ८-११ श्लोकों में यह बतलाया गया है कि जिन ग्रहों का आकार बड़ा है वह भारी होने के कारण अपने मन्दोच्चों, शीघ्रोच्चों इत्यादि के द्वारा कम खिंचते हैं और जो हल्के हैं वह बहुत खिंचते हैं। यह अनुमान सूक्ष्म निरूपण का फल है और आकर्षण सिद्धान्त के बिल्कुल अनुकूल है । सूर्य सिद्धान्त के इन्हीं आठ श्लोकों के आधार पर कुछ विद्वान यह कहते हैं कि आकर्षण सिद्धान्त के आविष्कारक न्यूटन नहीं कहे जा सकते वरन् हमारे ही प्राचीन ज्योतिषाचार्य हैं। निष्पक्ष भाव से विचार करने पर यह सिद्ध होता है कि हमारे पूज्य आचार्यों ने प्रत्यक्ष देखकर अपनी कल्पना और तर्क शक्ति से जितने अनुमान किये थे वह उस समय की दशा को देखते हुए परम सराहनीय हैं । उन्होंने यह अवश्य समझा था कि ग्रहों की गति की भिन्नता का कारण कोई शक्ति है, परन्तु यह नहीं ज्ञात हो सका था कि यह शक्ति किस प्रकार काम करती है, केवल पृथ्वी तथा ग्रहों के शीघ्रोच्चों, मन्दोच्चों और पातों में ही है अथवा जगत के सब पदार्थों में, और गणित की किस क्रिया द्वारा उपपत्ति बतलायी जा सकती है। आकर्षण सिद्धान्त के इस व्यापक नियम का आविष्कारक न्यूटन है। इसमें सन्देह नहीं कि यदि ज्योतिष का अध्ययन-अध्यापन भारतवर्ष में उसी प्रकार चला आता जैसा भास्कराचार्य, गणेश दैवज्ञ इत्यादि के समय में था या जैसा यूरोप के फ्रांस, जर्मनी और इंगलैंड में कोपर- निकस, टाइकोब्राही, केपलर, न्यूटन इत्यादि के समय में १६वीं, १७वीं शताब्दी में

सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक) · पृष्ठ 106, कुल 838 में से · BharatKosha