सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)
Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary
भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें८६ सूर्य सिद्धान्त ∵ स/क = १६' १७.६" या स = क × १६' १७.६" इसी प्रकार सूर्य का बिम्ब ३१' ३०.७" अथवा बिम्बार्द्ध १५' ४५.४" होता है तब यदि सूर्य की अत्यन्त अधिक दूरी 'का' हो तो स/का = १५' ४५.४" या स = का × १५' ४५.४" ∴ क × १६' १७.६" = का × १५' ४५.४" अथवा क/का = (१५' ४५.४") / (१६' १७.६") (१) जिस स्थान पर सूर्य सबसे बड़ा देख पड़ता है उससे जब १८०° आगे जाता है तब सबसे छोटा देख पड़ता है। इसलिए ऊपर निकाली हुई क, का दूरियाँ एक रेखा में होती हैं। इसलिए यदि दिये हुए चित्र १७ में प पृथ्वी का स्थान हो तो स और सा सूर्य के स्थान होंगे जब कि सूर्य क्रमानुसार सबसे बड़ा और सबसे छोटा देख पड़ता है अर्थात् जब प स = क और प सा = का स ───────────── प ─ म ───────────── सा चित्र १७ समीकरण (१) का प्रत्येक पक्ष यदि १ में से घटा दिया जाय तो, १ − क/का = १ − (१५' ४५.४") / (१६' १७.६") या (का − क)/का = ३२.२" / १६' १७.६" (२) और यदि समीकरण (१) के प्रत्येक पक्ष में १ जोड़ दिया जाय तो, (का + क)/का = ३२' ३" / १६' १७.६" (३) अब यदि समीकरण (२) को समीकरण (३) के समपक्षों से भाग देदें तो, (का − क)/(का + क) = ३२.२" / ३२' ३" = ३२.२" / १९२३" = १/६० के लगभग इस सम्बन्ध से प्रकट होता है कि प उस दीर्घवृत्त की नाभि है जिसका दीर्घ अक्ष स सा, केन्द्र स सा का मध्यविन्दु म और च्युति (eccentricity) १/६० है; क्योंकि किसी दीर्घवृत्त के केन्द्र से उसकी नाभि तक जो दूरी होती है उसको दीर्घ