भारतकोश
सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)

सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)

Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary

भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा

DevanagariHindipublished838 पृष्ठ

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१०६ सूर्यसिद्धान्त इस प्रकार यह प्रकट है कि पृथ्वी को चलती हुई मान लेने से ग्रहों की विलक्षण गतियों का समझना बड़ा ही सहज है। यदि पृथ्वी अचला मानी जाय तो यह किसी प्रकार नहीं समझाया जा सकता कि ग्रहों की वक्री गति क्यों होती है । तत्तद्गतिवशन्नित्यं यथा दृक्तुल्यतां ग्रहाः । प्रयान्ति तत्प्रवक्ष्यामि स्फुटीकरणमादरात् ॥१४॥ अनुवाद-(१४) इन इन गतियों के वश होकर ग्रह जिस प्रकार दृक्तुल्यता को प्राप्त होते हैं अर्थात् वेध के स्थान में पहुँचकर प्रत्यक्ष दिखाई देते हैं वही स्पष्ट करने के (उसी को गणित से जानने के) नियम आदर के साथ कहता हूँ । विज्ञान भाष्य - यह श्लोक बड़े महत्व का है। इससे सिद्ध होता है कि हमारे पुराने आचार्य ग्रहों के स्पष्ट स्थान इसीलिए निकालते थे जिससे गणित और प्रत्यक्ष वेध में कोई अंतर न पड़े। इसके लिए स्पष्टाधिकार में सूक्ष्म से सूक्ष्म नियम बनाये गये । परन्तु जैसा कि मध्यमाधिकार के ६वें श्लोक के विज्ञान भाष्य में मैं बतला चुका हूँ कि चाहे यंत्र स्थूल हों चाहे सूक्ष्म, इनसे बेध करने में कुछ न कुछ प्रयोगात्मक अशुद्धि (Experimental error) रह ही जाती है इसलिए काल पाकर कुछ भेद पड़ जाता है, जिससे समय-समय पर संशोधन करना पड़ता है। इसी को 'बीज' संस्कार कहते हैं । उदाहरण के लिए मान लीजिये कि कोई घड़ी प्रति दिन एक सेकंड मंद होती हो तो ६० दिन में वह १ मिनट और १ वर्ष में ६ मिनट पीछे हो जायगी । परन्तु व्यवहार में यही कहा जायगा कि घड़ी बहुत शुद्ध है; क्योंकि ६० दिन में १ मिनट का अंतर या प्रतिदिन एक सेकंड का अंतर नहीं के समान है। यदि यह अंतर सदैव होता जाय और घड़ी में संशोधन न किया जाय तो कई वर्षों में इतना अंतर पड़ जायगा कि उसको भी नहीं के समान समझना असम्भव होगा और संशोधन करना ही पड़ेगा । जैसे घड़ी में प्रतिदिन १ सेकंड का अंतर कुछ काल में बड़ा भारी रूप धारण कर सकता है उसी प्रकार सूर्य चन्द्रमा इत्यादि ग्रहों के भगणकालों में १ पल का भी अंतर सैकड़ों वर्षों में बहुत बड़ा हो जाता है। इसीलिए बीज संस्कार करना पड़ता है । बीच-बीच में संशोधन करने की प्रथा हमारे प्राचीन आचार्यों को मान्य थी, जिनके अवतरण मैं नीचे दूंगा; परन्तु कुछ दिनों से इस विषय पर मतभेद हो गया है। एक पक्ष कहता है कि आर्ष ग्रन्थों पर किसी प्रकार की टीका टिप्पणी करने का अथवा संशोधन करने का अधिकार नहीं है, उनमें जो कुछ है उसको वैसा ही मानना चाहिये । दूसरा पक्ष कहता है कि संशोधन करना सर्वथा उचित है । नीचे दोनों पक्षों के तर्क मुझे जहाँ तक मिले हैं दिये जाते हैं : -