भारतकोश
सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)

सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)

Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary

भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा

DevanagariHindipublished838 पृष्ठ

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पृष्ठ 130

स्पष्टाधिकार १०७ प्रयाग निवासी पंडित इन्द्रनारायण द्विवेदी ज्योतिष भूषण, इसी श्लोक के अनुवाद के साथ साथ यह टिप्पणी देते हैं— "यहाँ अनेक लोग "दृक्तुल्यतः" से दृश्य गणना का अर्थ लगाते हैं; किन्तु यह उनका भ्रम है। पूर्वापर के देखने से स्पष्ट ज्ञात हो जाता है कि दृक्तुल्यतां का अर्थ यहाँ जिस गणना का वर्णन करते हैं उसके अनुसार अदृश्य दृष्टि से अपने स्पष्ट किये हुए स्थान पर दिखाई देना है अन्यथा इस गणना के अनुसार कभी भी दृश्य ग्रह सिद्ध नहीं हो सकते थे क्योंकि जितने संस्कार दृश्य ग्रहों के लिए आज निकाले गये हैं ये ही सदा होने चाहिये ये यह गोल विद्या के जानने वालों को ज्ञात ही है"१ इस अवतरण का भांवार्थ कदाचित यह है कि ग्रहों का स्पष्ट स्थान निकालने के लिए जो नियम इस ग्रन्थ में बतलाये गये हैं उनके अनुसार ग्रहों का स्थान वही नहीं निकलता जो प्रत्यक्ष वेध से देखा जाता है। इसलिए दृक्तुल्यता का अर्थ प्रत्यक्ष वेध नहीं है वरन् वह अदृश्य वेध है जिसे ऋषियों ने अपने योगबल के द्वारा जाना था । इस पक्ष के ज्योतिषाचार्य पं० गिरिजाप्रसाद जी द्विवेदी जो आजकल लखनऊ के नवल किशोर विद्यालय के प्रधानाध्यापक हैं अपने सिद्धान्त शिरोमणि गोलाध्याय के 'प्रभा भाषा भाष्य' २ पृष्ठ ६, ७ में बहुत स्पष्ट शब्दों में यों लिखते हैं :— "...दृष्टादृष्टभेदेन गणितस्य द्वैविध्यं तावच्चतुरस्रम् । तत्र 'अदृष्टफलसिद्धयर्थं यथाकार्द्युक्तिः कुरु । गणितं यद्धि दृष्टार्थं तद्दृष्ट्युद्भवतः सदा' ।। तथा अदृष्टफल सिद्धयर्थं निर्बीजार्कोक्तमेवहि ।' इति तत्वविवेकीय कमलाकरोक्त्या महर्षि दर्शित पथानुसारिण एवं स्फुटाः खेटाः फलादेशायोपयुज्यन्ते नतु सांप्रतिकोपलब्ध संस्कार संस्कृताः । निर्बीजार्कोक्तिमित्युक्त्या तन्निरासात् । फलविषयेऽनार्षगणिताङ्गीकारे बहुत्र श्रौतस्मार्तकर्मानुष्ठानसमयादिषु विप्लवः संजायते । तस्माद्धर्माभिमानिभिः सुधीभिः सकलं परीक्ष्य निष्कण्टकः पन्था अनुसरणीयः । तत्तत्संस्कारोत्पन्नाः खेटास्तु केवलं ग्रह- णोदयास्तादि दृष्टगणितएवोपयुज्यन्ते । दृष्टगणिताभिमानिनोऽदृष्टगणितोन्मूलनाय बहुधा विवदन्ते । परमुभयो स्वीकारेणैव निर्बाहो नत्वन्यतरस्याङ्गीकारेणेत्यन्यत्र विस्तरः । "दृष्ट और अदृष्ट के भेद से गणित दो प्रकार का है । दृष्ट जो आँखों से देखा जाय, जैसे ग्रहण, उदयास्त, युति और श्रृङ्गोन्नति आदि । और अदृष्ट जो देखने में न आवे, जैसे तिथियोग आदि । ग्रहण आदि के देखने से ही उसका फल होता है । और व्रत उपवास आदि का फल बिना देखे ही होता है। फल का आदेश केवल ऋषियों १. प्रयाग के हिन्दी साहित्य सम्मेलन से प्रकाशित सूर्य सिद्धान्त पृष्ठ ३५ । २. लखनऊ से नवल किशोर प्रेस में १६११ ई० में प्रकाशित ।