सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)
Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary
भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें११० सूर्य-सिद्धान्त मकरंद सारिणी में बीज संस्कार के विषय में यह अवतरण प्रमाण है । (२) “…कलिगतस्य सहस्रांशों १००० शादि ४ । ४२ । ४६ शनि बीज धनं ॥ एतद्यंशे १ । ३५ । १५ सहितं जातं बुधोच्च धनं ६ । १७ । १ शनिबीज व्यंशेन रहितं जातं ३ । ८ । ३१ ऋणंगुरोः शनिबीजं शुक्रोच्च ऋणं ४। ४२ । ४६ बीज संस्कृतं बुधोच्चं …”१ प्रसिद्ध ज्योतिषी शंकर बालकृष्ण दीक्षित अपने मराठी भारतीय ज्योतिः शास्त्र पृष्ठ १८४ तथा २५७ में लिखते हैं :- (३) “मकरंदग्रंथां। सूर्यसिद्धान्तोक्त ग्रहादिकांस बीज संस्कार आहे”...; “मकरंदकारानें सूर्यसिद्धांतास बीजसंस्कारदिलाआहे, त्या विषयीं पूर्वी लिहिलेंच आहे” इन अवतरणों से सिद्ध है कि सैकड़ों वर्षों से मकरंदसारिणी अथवा ग्रहलाघव के अनुसार जितने पंचांग बनते हैं सबमें बीज संस्कार के अनुसार संशोधन रहता है । इसलिए कमलाकर जी की उक्ति व्यवहार में कभी नहीं मानी गयी, ऐसा मेरा विचार है । कमलाकर जी ने आचार्य वशिष्ठ के इस श्लोक को "इत्थं माण्डव्य संक्षेपा- दुक्तं शास्त्रमयोदितं । विस्रस्ती रविचन्द्राद्यैर्भविष्यति युगे युगे” के ‘विस्रस्ती’ पद को ‘विस्तृती’ कहकर श्लोक का अर्थ कुछ और कर दिया है परन्तु यह सर्वथा अवैज्ञानिक, भ्रमजनक तथा प्राचीन वैज्ञानिक पद्धति के विरुद्ध है और केवल अपने पक्ष को पुष्ट करने के लिए लिखा गया है । अब मैं दूसरे पक्ष के समर्थन में जो कुछ प्रायः डेढ़ हजार वर्षों से कहा गया है वह लिख रहा हूँ, जिससे सिद्ध होगा कि हमारे प्राचीन ज्योतिषी ज्योतिष के आर्ष ग्रन्थों को किस दृष्टि से देखते रहे हैं और इनको समय-समय पर संशोधन करने के पक्ष में कौन-कौन सी युक्तियाँ लिख गये हैं । जिस समय सूर्यांश पुरुष मयासुर को सूर्य-सिद्धान्त का उपदेश देने लगे उस समय कहा था, ‘शास्त्रमाद्यं तदेवेदं यत्पूर्वं प्राह भास्करः । युगानां परिवर्तैन कालभेदोत्र केवलं ॥” यह मध्यमाधिकार का ६वां श्लोक है; जिसकी व्याख्या की जा चुकी है । फिर जब ऋषियों ने मयासुर से ज्योतिष का उपदेश ग्रहण किया था तब पहले मयासुर ने जो कुछ सूर्यांश पुरुष से सीखा था वह सब कह कर अन्त में बीजोप- नयनाध्याय का उपदेश २१ श्लोकों में दिया जिसका कारण यह बतलाया था, १. मकरंद सारिणी पृष्ठ ३६, बंबई की छपी ।