सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)
Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary
भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंस्पष्टाधिकार १११ “चक्रानुपातजोमध्यो मध्यवृत्तांशजः स्फुटः । कालेन दृक्समो न स्यात् ततो बीजक्रियोच्यते ॥ ५ ॥ बीजं निःशेष सिद्धान्त रहस्य परमं स्फुटं । यात्रापाणिग्रहादीनां कार्याणां शुभसिद्धिदम् ॥ २१ ॥” अर्थात् काल पाकर दृक्तुल्यता नहीं होती है इसलिए बीज क्रिया की रीति बतलायी जाती है । बीज क्रिया से संस्कृत स्फुट ग्रहों से ही यात्रा विवाह तथा अन्य शुभ काम फलदायक होते हैं । परन्तु खेद है कि पहले पक्ष के पंडित इस अध्याय को क्षेपक मानते हैं । मेरी समझ में तो यह बात आती है कि सूर्यांश पुरुष ने जो कुछ कहा था उसके अनुसार यह अवश्य क्षेपक है क्योंकि यह मयासुर का बीज संस्कार है न कि सूर्यांश पुरुष का । परन्तु यदि यह मान लिया जाय कि मयासुर ने ऋषियों से जैसा कहा था वैसा ही ऋषियों का पाया हुआ सूर्य सिद्धान्त इस समय प्रचलित है तब इसको क्षेपक मानने की कोई आवश्यकता नहीं रह जाती । बात भी यथार्थ में यही है कि प्रचलित सूर्य सिद्धान्त वही है जिसका उपदेश मयासुर ने ऋषियों को दिया था । इसमें बीजो- पनयनाध्याय अंत में इसलिए कहा जिसमें यह स्पष्ट रहे कि मयासुर को सूर्यांश पुरुष से क्या उपदेश मिला था और मयासुर ने स्वयं अपने अनुभव से क्या बढ़ाया था । दृक्तुल्यता के सम्बन्ध में ब्रह्मगुप्त जी शक ५५०, संवत ६८५ वि०, में लिखते हैं :— “प्रतिदिवस विसंवादाद् ग्रह तिथि करणक्षं दिवसमासानाम् । ग्रहणग्रह- योगादिषु पादं पादेन कः स्पृशति ॥ ५७ ॥ तन्त्रभ्रन्शे प्रतिदिनमेवं विज्ञाय धीमता यत्नः । कार्यस्तस्मिन् यस्मिन् दृग्गणितैक्यं सदा भवति ।। इन दोनों श्लोकों के तिलक में म० म० सुधाकर द्विवेदी जी लिखते हैं :— "ग्रह-तिथि-करण-ऋक्ष-दिवस मासानां तथा ग्रहण-ग्रह योगादिषु च प्रतिदिवस विसंवादात् प्रत्यहं दृग्विरोधात् पादं करणाधमं कः पादेनापि स्पृशति अर्थात्थाऽङ्गेषु अधोवृत्तित्वात् पादोऽधमस्तथा दृग्गणितयोरसाम्यात् पादमधमं यत् करणं तत् पादेनापि स्पर्शनार्हं 'प्रक्षालनाद्धि पङ्कस्य दूरादस्पर्शनं वरम्'-इतिन्यायात्” "तन्त्रभ्रंशे सति तदीयतन्त्रगणनया दृग्विरोधे सति एवं पूर्वोक्तं प्रतिदिनं स्पष्टीकरणार्थं वेधादिना विज्ञाय तस्मिन् तन्त्रे वीजादिना तथा यत्नः कार्यो यथा