सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)
Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary
भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें११२ सूर्य सिद्धान्त दृग्गणितैक्यं भवति । एवं यस्मिन् तन्त्रे सदा दृग्गणितैक्यं भवति तदेव तन्त्रमादरणीय- मिति ।"१ ऊपर के अवतरण में ग्रह, युति इत्यादि के साथ साथ तिथि, करण, ऋक्ष ( नक्षत्र ) शब्द भी आये हैं; जिससे प्रकट है कि जिसको पंडित गिरिजाप्रसाद जी ने अदृष्ट कहा है उसके लिए भी दृग्गणितैक्य का विधान है और बीज संस्कार करने की आवश्यकता बतलायी गयी है । इसलिए दृक्तुल्यता के लिए संस्कार करना ब्रह्मगुप्त जी शास्त्र विरुद्ध या आर्ष वचनों के विरुद्ध नहीं समझते थे । जिसको इन्होंने शास्त्र विरुद्ध समझा था उसका बड़े जोरों से खण्डन किया है । प्रसिद्ध भास्कराचार्य जी शक १०७२ संवत् १२०७ वि० में लिखते हैं :— "यात्रा विवाहोत्सवजातकादौ खेटैः स्फुटैरेव फलस्फुटत्वं । स्यात् प्रोच्यते तेन नभश्चराणां स्फुटक्रिया दृग्गणितैक्य कृद्या ।"२ जिसका अर्थ यह है कि यात्रा विवाह उत्सव जातक इत्यादि कामों के लिए ग्रह स्पष्ट करने से अधिक फल होता है और ग्रह स्पष्ट करने की रीति वही शुद्ध है जिससे दृग्गणितैक्य हो । ऊपर इस बात का प्रमाण दिया गया है कि आजकल ग्रहलाघव कितना मान्य समझा जाता है । इसी ग्रहलाघव के कर्ता आचार्य गणेश दैवज्ञ के पिता आचार्य केशव ने प्राचीन ग्रन्थों में संशोधन करने के पक्ष में शक १४१८ संवत् १५५३ वि० में ग्रह-कौतुक नामक ग्रन्थ में यों लिखा है :— "ब्राह्मार्यभट सौराद्येष्वपि ग्रहकरणेषु बुधशुक्रयोर्महदंतरं अंकतया दृश्यते । मंदे आकाशे नक्षत्र ग्रहयोगे उदयेऽस्ते च पंच भागा अधिकाः प्रत्यक्षमंतरं दृश्यते ।······एवं क्षेपेष्वंतरं वर्ष भोगेष्वपि अंतरमस्ति । एवं बहुकाले बह्वंतरं भविष्यति । यतो ब्राह्माद्ये- ष्वपि भगणानां सावनादीनां च बह्वतरं दृश्यते एवं बहुकाले बह्वंतरं भवत्येव ।······ एवं बह्वंतरं भविष्येः सुगणकैः नक्षत्रयोग ग्रहयोगोदयास्तादिभि वर्तमान घटनामवलोक्य न्यूनाधिक भगणाद्यैर्ग्रहगणितानि कार्याणि । यद्वा तत्काल क्षेपक वर्ष भोगान् प्रकल्प्य लघु करणानि कार्याणि ।······एवं मया परम फल स्थाने चन्द्र ग्रहण तिथ्यंताद् विलोमविधिना मध्यमचंद्रोज्ञातः तन्न फल हास वृद्ध्यभावात् । केन्द्रगोलादि स्थाने ग्रहण तिथ्यंताद्विलोम विधिना चंद्रोच्चमाकलितं । तन्न फलस्य परम हास वृद्धित्वात् । १. तन्त्रपरीक्षाध्याय पृष्ठ १६६-१७०, म० म० सुधाकर द्विवेदी द्वारा सम्पादित ब्रह्मस्फुट सिद्धान्त । २, सिद्धान्त शिरोमणि गणिताध्याय पृष्ठ ५६ ।