भारतकोश
सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)

सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)

Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary

भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा

DevanagariHindipublished838 पृष्ठ

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स्पष्टाधिकार ११३ तत्र चंद्रः सूर्यपक्षात्पंचकलोनो दृष्टः । उच्चं ब्रह्मपक्षाश्रितं । सूर्यः सर्वपक्षेपीषदंतरः स सौरो गृहीतः । अन्ये ग्रहा नक्षत्र ग्रहयोगास्तोदयादिभिर्वर्तमानघटनामवलोक्य साधिताः । तत्रेदानों भोमेज्यो ब्राह्मपक्षाश्रितो घटतः । ब्राह्मो बुधः । ब्राह्मार्थमध्य शुक्रः । शनि पक्षत्रयात्पंचभागाधिको दृष्टः । एवं वर्तमान घटनामवलोक्य लघुकर्मणा ग्रह गणितं कृतं ।"१ इस लम्बे अवतरण से यह अच्छी तरह स्पष्ट होता है कि वर्तमान आकाशीय घटनाओं को किस प्रकार वेध द्वारा देखकर सूर्य चन्द्रमा इत्यादि ग्रहों के भगण कालों का संशोधन करना चाहिये । भविष्य के लिए भी ऐसा करने को आदेश किया गया है । इस अवतरण में सूर्य-सिद्धान्त का भी स्पष्ट उल्लेख है । पिता के इन्हीं वेधों और बीजों के आधार पर आचार्य गणेश दैवज्ञ ने 'ग्रहलाघव' बनाया जिसके मध्यमा- धिकार के १६वें श्लोक में शक १४४२, संवत् १५७७ वि० में लिखा है । "सौरोंऽर्कोऽपि विधूच्चमङ्क कलिकोनाब्जो गुरुस्त्वार्यजो, ऽ सृग राहु च कजं ज्ञकेन्द्रक्रमयार्ये सेषुभागः शनिः । शौक्रं केन्द्रम नार्यमध्यगमिती मे यान्ति दृक्तुल्यतां, सिद्धैस्तैरहिपर्व धर्म नय सत्कार्यादिकं त्वादिशेत् ॥"२ जिससे प्रकट है कि गणेश जी पर्व धर्म, उत्सव इत्यादि सभी शुभ काम दृग्गणितैक्य से ही निश्चय करने का आदेश करते हैं न कि 'निर्बीज' सूर्य-सिद्धान्त से । इसकी टीका में मल्लारि जी शक १५४७ संवत् १६८० वि० में लिखते हैं, "......इति तेभ्यः पक्षेभ्यः साधिता इमे ग्रहाः दृशितुल्यतां दृग्गणितैक्यं यान्ति...... इहा स्मिन् ग्रन्थे सिद्धैस्तैर्ग्रहैः पर्व धर्मनयसत्कार्यादिकमादिशेत् । पर्व ग्रहण धम्मों यज्ञानुष्ठानेकादशी व्रतादिकम् । नयो नीतिः । राजनीति दण्डनीत्यादिकः । सत्कार्यं शुभं कार्यंत्रतबन्ध विवाहादि । एभ्यो ग्रन्थेभ्य एतदुत्पन्न तिथ्यादेरेवादिशेत् अयं भावः । यतो यस्मिन् यस्मिन् काले यद्यद् दृग्गणितैक्यकृतद्देवग्राह्यं घटमानत्वात् ।"३ फिर मल्लारि जी कहते हैं, "अहर्गणात्साधितो यो ग्रहः स मध्यमो यतो यन्त्र- वेधेनाकाशे विलोक्यमाने तावान् ग्रहो न दृष्टः किञ्चिदंतरं दृष्टं प्रत्यहं गतेर्विसदृ- शत्वात् । एवं प्रत्यहं ग्रहान् गोलेन चक्रयन्त्रेण वा विदृश्वा अहर्गणोत्पन्न मध्यम ग्रह वेधित स्पष्टग्रहयोरन्तराणि साधितानि ।"४ १. मराठी भारतीय ज्योतिःशास्त्र पृष्ठ २५६ में उद्धृत । २. म० म० सुधाकर द्विवेदी सम्पादित ग्रहलाघव पृष्ठ ७० । ३. वही, ग्रहलाघव पृष्ठ ७० । ४. वही, ग्रहलाघव पृष्ठ ७२ । ८

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