सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)
Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary
भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें११४ सूर्य सिद्धान्त मल्लारि जी एक जगह और लिखते हैं “एवं ग्रहभगणभोगपर्यन्तं ग्रहगतीरानीय तासु मध्ये या परमाधिका गतिर्याच परमाल्पा तयोर्योगाधं मध्यगतिरेवाङ्गी कृता । सा दुःसाध्या सूक्ष्माणां विकला कोट्यं शादीनामलक्ष्यत्वात् । सा स्थूला जाता सैवाङ्गी- कृता । एवं कियत्यपि काले जाते वसिष्ठादिभिर्विलोक्यमाने गतेरन्तरं दृष्टम् । एव- मन्यैरपि ।...............अस्मिन्काले एतद्द्ग्गोचराः एवमग्रेऽपि भविष्यन्महागण- कैर्नलिकाबन्धादिना ग्रहवेधं कृत्वाऽन्तरानि लक्ष्यित्वा ग्रहकरणानि कार्याणीत्यग्रे ग्रन्थ समाप्तावाचार्येणायुक्तमस्ति ।"१ इस अवतरण में जिस तर्क से मल्लारि जी ने काम लिया है उसको सिद्ध करने के लिए वराह-मिहिर, वशिष्ट, सूर्यसिद्धान्त, ब्रह्मगुप्त सिद्धान्त सभी के अवतरण दिये हैं जो इस जगह छोड़ दिये गये हैं, क्योंकि इनको मैंने पहले ही दे दिया है । दृक्तुल्यता के लिए वेध करके ही परीक्षा ली जा सकती है इसलिए गणित और वेध में जब समता हो तभी नियम शुद्ध कहा जा सकता है । मल्लारि जी की यह बात १६ आने पावरत्ती ठीक है कि वेध द्वारा प्राप्त हुई संख्याओं में कुछ न कुछ स्थूलता 'विकलाकोट्यंशादीनामलक्ष्यत्वात्' रह ही जाती है, जिसके लिए समय समय पर वर्तमान घटनाओं को देखकर संशोधन करना चाहिये । अनेक लम्बे अवतरणों से पाठक ऊब गये होंगे, इसलिए मैं आचार्य गणेश दैवज्ञ की पुस्तक वृहत्तिथिचिन्तामणि से अवतरण न दूंगा । यद्यपि इसमें संक्षेप में ब्रह्माचार्य, वशिष्ठ, कश्यप, मयासुर, आर्यभट, दुर्गसिंह मिहिर, ब्रह्मगुप्त, केशव, इत्यादि सब के अवलोकनों की चर्चा करते हुए बतलाया गया है कि इनमें अंतर क्यों पड़ गया और उनको नये ग्रन्थ के बनाने की उस समय क्यों आवश्यकता पड़ी तथा जब आगे आवश्यकता पड़ेगी तब कैसे संशोधन करना चाहिये । फिर भी अन्त का एक श्लोक दिये बिना रहा नहीं जाता जो यों है :- “कथमपि यदिदं चेद्भूूरिकाले श्लथंस्यान्, मुहुरपि परिलक्ष्येन्दु ग्रहाद्युक्षयोगम् ॥ सदमलगुरुतुल्यप्राप्तबुद्धिप्रकाशैः कथित सदुपपत्या शुद्धिकेन्द्रे प्रचाल्ये ।।”२ इन अवतरणों को पढ़कर कौन ऐसा होगा जो न मानेगा कि हमारे पुराने आचार्य और वैज्ञानिक युक्तियुक्त तर्कों से यह आवश्यकता दिखला गये हैं कि दृग्गणि- १. म० म० सुधाकर द्विवेदी सम्पादित ग्रहलाघव पृष्ठ ५५ । २. म० म० सुधाकर द्विवेदी सम्पादित गणकतरंगणी पृष्ठ ६३ ।