सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)
Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary
भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंस्पष्टाधिकार ११५ तैक्य के लिए समय-समय पर सिद्धान्त ग्रन्थों में भी संशोधन करने की आवश्यकता है और इसी संशोधन के साथ तिथि, योग, करण, नक्षत्र इत्यादि जानकर सभी लौकिक काम करने चाहिये ? आजकल का कोई “अंग्रेजी गणितविद्याविशारद" भी अपने पक्ष के समर्थन में पुराने आचार्य जो कुछ कह गये हैं उससे अधिक कहने की अवश्कता नहीं समझ सकता । राशिलिप्ताष्टमो भागः प्रथमं ज्यार्धमुच्यते । तत्तद्विभक्त लब्धोनमिश्रितं तद् द्वितीयकम् ।।१५।। आद्येनैवं क्रमात्पिण्डान्भक्त्वा लब्धोनितैर्युतैः । खण्डकैस्स्युश्चतुर्विशज्ज्यार्धपिण्डाः क्रमादमी ।।१६।। अनुवाद—(१५) एक राशि में जितनी कलाएँ होती हैं उसके आठवें भाग को पहली 'ज्या' कहते हैं । इसको इसी से भाग देकर लब्धि को इसी में घटाकर शेष को इसी में (पहली ज्या में) जोड़ देने से दूसरी ज्या निकल आती है । (१६) इसी प्रकार आदि से लेकर सब ज्याओं को पहली ज्या से भाग देकर भाग फलों को जोड़ कर, योगफल को पहली ज्या में से घटाकर शेष को अन्तिम ज्या में जोड़ दो तो जो योगफल मिलेगा वही अगली ज्या होगी । इस प्रकार क्रम से २४ ज्याओं के पिंड होंगे । विज्ञान भाष्य—ज्या किसको कहते हैं और इसका मान रेखागणित से कैसे निकाला जाता है इसका विवेचन मध्यमाधिकार के ६० वें श्लोक के विज्ञान भाष्य में किया गया है । उस श्लोक के नीचे जो दूसरा चित्र दिया गया है उसको देखना चाहिये । ऊपर १५ वें श्लोक में 'ज्या' के स्थान में 'ज्यार्ध' शब्द का प्रयोग हुआ है, इससे भ्रम में न पड़ना चाहिये । दोनों के अर्थ समान माने गये हैं । 'ज्या' के लिए 'ज्यार्ध' इसलिए कहा गया है कि किसी कोण उ अ आ को 'ज्या' जानने के लिए सबसे सरल रीति यह है कि एक ऐसा वृत्तखंड (Sector) उ अ ऊ बनाओ जिसका केन्द्रीय कोण अ अभीष्ट कोण का दूना हो, फिर इस वृत्तखंड की जीवा या ज्या उ ऊ खींच लो और उसका आधा कर दो । बस इसी जीवा का आधा (ज्यार्ध) उ इ अभीष्ट कोण की ज्या है । इसीलिए ज्यार्ध और ज्या समानार्थवाची हैं (चित्र २४) । इस श्लोक से यह भी पता चलता है कि आचार्य ने एक राशि के ८वें भाग अर्थात् ३ ३/४ अंश या २२५ कला के धनु (arc) और ज्या (line) में कोई अन्तर नहीं समझा है । इसके बाद ३ ३/४ अंश के दूने, तिगुने, चौगुने, इत्यादि अंशों की ज्याएँ कैसे ज्ञात की जाती हैं इसकी रीति बतलायी गयी है । संक्षेप में, बीजगणित की भाषा में रीति यों लिखी जा सकती है:—