सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)
Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary
भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा
स्पष्टाधिकार ११५ तैक्य के लिए समय-समय पर सिद्धान्त ग्रन्थों में भी संशोधन करने की आवश्यकता है और इसी संशोधन के साथ तिथि, योग, करण, नक्षत्र इत्यादि जानकर सभी लौकिक काम करने चाहिये ? आजकल का कोई “अंग्रेजी गणितविद्याविशारद" भी अपने पक्ष के समर्थन में पुराने आचार्य जो कुछ कह गये हैं उससे अधिक कहने की अवश्कता नहीं समझ सकता । राशिलिप्ताष्टमो भागः प्रथमं ज्यार्धमुच्यते । तत्तद्विभक्त लब्धोनमिश्रितं तद् द्वितीयकम् ।।१५।। आद्येनैवं क्रमात्पिण्डान्भक्त्वा लब्धोनितैर्युतैः । खण्डकैस्स्युश्चतुर्विशज्ज्यार्धपिण्डाः क्रमादमी ।।१६।। अनुवाद—(१५) एक राशि में जितनी कलाएँ होती हैं उसके आठवें भाग को पहली 'ज्या' कहते हैं । इसको इसी से भाग देकर लब्धि को इसी में घटाकर शेष को इसी में (पहली ज्या में) जोड़ देने से दूसरी ज्या निकल आती है । (१६) इसी प्रकार आदि से लेकर सब ज्याओं को पहली ज्या से भाग देकर भाग फलों को जोड़ कर, योगफल को पहली ज्या में से घटाकर शेष को अन्तिम ज्या में जोड़ दो तो जो योगफल मिलेगा वही अगली ज्या होगी । इस प्रकार क्रम से २४ ज्याओं के पिंड होंगे । विज्ञान भाष्य—ज्या किसको कहते हैं और इसका मान रेखागणित से कैसे निकाला जाता है इसका विवेचन मध्यमाधिकार के ६० वें श्लोक के विज्ञान भाष्य में किया गया है । उस श्लोक के नीचे जो दूसरा चित्र दिया गया है उसको देखना चाहिये । ऊपर १५ वें श्लोक में 'ज्या' के स्थान में 'ज्यार्ध' शब्द का प्रयोग हुआ है, इससे भ्रम में न पड़ना चाहिये । दोनों के अर्थ समान माने गये हैं । 'ज्या' के लिए 'ज्यार्ध' इसलिए कहा गया है कि किसी कोण उ अ आ को 'ज्या' जानने के लिए सबसे सरल रीति यह है कि एक ऐसा वृत्तखंड (Sector) उ अ ऊ बनाओ जिसका केन्द्रीय कोण अ अभीष्ट कोण का दूना हो, फिर इस वृत्तखंड की जीवा या ज्या उ ऊ खींच लो और उसका आधा कर दो । बस इसी जीवा का आधा (ज्यार्ध) उ इ अभीष्ट कोण की ज्या है । इसीलिए ज्यार्ध और ज्या समानार्थवाची हैं (चित्र २४) । इस श्लोक से यह भी पता चलता है कि आचार्य ने एक राशि के ८वें भाग अर्थात् ३ ३/४ अंश या २२५ कला के धनु (arc) और ज्या (line) में कोई अन्तर नहीं समझा है । इसके बाद ३ ३/४ अंश के दूने, तिगुने, चौगुने, इत्यादि अंशों की ज्याएँ कैसे ज्ञात की जाती हैं इसकी रीति बतलायी गयी है । संक्षेप में, बीजगणित की भाषा में रीति यों लिखी जा सकती है:—
११६ सूर्य सिद्धान्त उ अ इ आ ऊ चित्र २४ यदि प = ३ ३/४ अंश = २२५' तो ज्या प = २२५' ज्या प ज्या ७ १/२ अंश = ज्या २ प = ज्या प + ज्या प - ――― = २२५' + २२५' - १' ज्या प = ४४६'; ज्या प + ज्या २ प ज्या ११ १/४ अंश = ज्या ३ प = ज्या २ प + ज्या प - ――――――― ज्या प = ४४६' + २२५' - ३ = ६७१' ; ज्या प + ज्या २ प + ज्या ३ प ज्या १५° = ज्या ४ प = ज्या ३ प + ज्या प - ――――――――――― ज्या प = ६७१' + २२५' - (१ + २ + ३) = ८६०' ; इसी प्रकार ज्या (स + १) प ज्या प + ज्या २ प + ... ज्या (स प) = ज्या ( स प ) + ज्या प - ――――――――――――――― ज्या प इसकी उपपत्ति महामहोपाध्याय बापूदेव शास्त्रीजी के अनुसार १ यह है :-- कल्पना करो, ज्या प - ज्या ० = त१, ज्या २ प - ज्या प = त२, ज्या ३ प - ज्या २ प = त३,
१. देखो सूर्य सिद्धान्त का बापूदेवजी शास्त्री द्वारा अंग्रेजी अनुवाद
स्पष्टाधिकार ११७ ज्या नप - ज्या (न - १) प = त_{न} और ज्या (न + १) प - ज्या न प = त_{न+१} तब, त_{१} - त_{२} = २ ज्या प - ज्या २ प = २ ज्या प - २ ज्या प कोज्या प* = २ ज्या प ( १ - कोज्या प ) = २ ज्या प × उज्या प** (१) त_{२} - त_{३} = २ ज्या २ प - ज्या प - ज्या ३ प = २ ज्या २ प - ज्याप - (३ ज्या प - ४ ज्या³ प) = २ ज्या २ प - ४ ज्या प + ४ ज्या³ प = २ ज्या २ प - ४ ज्या प (१ - ज्या² प) = २ ज्या २ प - ४ ज्या प × कोज्या² प = २ ज्या २ प - २ ज्या प × कोज्या प × २ कोज्या प = २ ज्या २ प - २ ज्या २ प × कोज्या प = २ ज्या २ प (१ - कोज्या प) = २ ज्या २ प × उज्या प (२) त_{३} - त_{४} = २ ज्या ३ प - ज्या २ प - ज्या ४ प = २ ज्या ३ प - (ज्या २ प + ज्या ४ प) = २ ज्या ३ प - २ ज्या ३ प × कोज्या प*** = २ ज्या ३ प (१ - कोज्या प) = २ ज्या ३ प × उज्या प (३) इसी प्रकार त_{न} - त_{न+१} = २ ज्या नप - ज्या (न - १) प - ज्या (न + १) प = २ ज्या नप - {ज्या (न - १) प + ज्या (न + १) प} = २ ज्या नप - २ ज्या नप कोज्या प = २ ज्या नप (१ - कोज्या प) = २ ज्या नप × उज्या प (न)
- कोज्या = कोटिज्या = cosine × × उज्या = उत्क्रमज्या = versed sine = (1 - cosine) = १ - कोज्या × × × देखो Hall and Knight's Trigonometry page 113.
११८ सूर्य सिद्धान्त अब (१), (२), (३)...(न) समीकरणों के सम पक्षों को जोड़ने से त₁ - त_{न+१} = २ उज्या प (ज्या प + ज्या २ प ,
- ज्या ३ प +...ज्या नप) परन्तु त₁ - त_{न+१} = ज्या प + ज्या नप - ज्या (न + १) प ∵ ज्या प + ज्या नप - ज्या (न + १) प = २ उज्या प × (ज्या प + ज्या २ प +...ज्या नप) ∵ ज्या (न + १) प = ज्या नप + ज्या प - २ उज्या प (ज्या प + ज्या २ प +...ज्या नप) यहाँ प = ३°४५' = २२५' ∴ २ उज्या प = २ उज्या २२५' = २ (१ - कोज्या २२५') = २ (१ - .९९७८) = २ × .००२२ = ४४ / १०००० = १ / २२७ = १ / २२५ स्वल्पान्तर से ∴ ज्या (न + १) प = ज्या नप + ज्या प - १ / २२५ × (ज्या प + ज्या २प +...ज्या नप) तत्त्वाश्विनोऽङ्काब्धिवेदा रूपभूमिधरर्तवः । खाङ्काष्टौ पञ्चशून्येशा वाणभूमिगुणेन्दवः ॥१७॥ शून्यलोचनपञ्चैकाश्छिद्ररूपमुनीन्दवः । वियच्चन्द्रातिधृतयो गुणरन्ध्राम्बराशिषः ॥१८॥ मुनिषड्यमनेत्राणि चन्द्राग्निकृतदस्रकाः । पञ्चाष्टविषयाक्षोणि कुञ्जराश्विनगश्विनः ॥१९॥ रन्ध्रपञ्चाष्टकयमा वस्वद्र्यङ्कयमास्तथा । कृताष्टशून्यज्वलना नगाद्रिशशिवह्नयः ॥२०॥ षट्पञ्चलोचनगुणाश्चन्द्रनेत्राग्निवह्नयः । यमाद्रिवह्निज्वलना रन्ध्रशून्यार्णवाग्नयः ॥२१॥ रूपाग्निसागरगुणा वसुत्रिकृतवह्नयः । प्रोज्झ्योत्क्रमेण व्यासार्धादुत्क्रमज्यार्धपिण्डकाः ॥२२॥ अनुवाद—(१७) २२५, ४४६, ६७१, ८६०, ११०५, १३१५; (१८) १५२०, १७१६, १९१०, २०६३; (१९) २२६७, २४३१, २५८५, २७२८; (२०) २८५६,
२६७८, ३०८४, ३१७७; (२१) ३२५६, ३३२१, ३३७२, ३४०६; (२२) ३४३१, ३४३८ कलाएं क्रम से ३¾ अंश, ७½ अंश, ११¼ अंश, १५ अंश इत्यादि एक समकोण के २४ पिंडों की ज्याएं हैं। यदि इनको उलटे क्रम से (उत्क्रम से) एक त्रिज्या की कलाओं से अर्थात् ३४३८ से घटा दो तो एक समकोण के २४ पिंडों की क्रम से उत्क्रम ज्याएं ज्ञात हो जायंगी । इनके मान भी आगे के पांच श्लोकों में दिये हुए हैं । विज्ञान भाष्य - इस सम्बन्ध में अधिक कहने की आवश्यकता नहीं जान पड़ती है। अगले पांच श्लोकों के बाद इन ज्याओं और उत्क्रम ज्याओं के मानों की तुलना आजकल की रीति से निकाले हुए मानों से की जायगी। उत्क्रम ज्या के मान जानने के लिए जो नियम लिखा गया है वह बहुत ही सरल और मौलिक है। यदि ३४३८ में से अंतिम संख्या ३४३८ घटायी जाय तो शून्य बचेगा जो शून्य अंश की उत्क्रम ज्या है और यदि ३४३१ घटाया जाय तो ७ बचेगा जो २२५ कला की उत्क्रम ज्या है। इसको रेखागणित के आधार पर इस प्रकार जान सकते हैं—चित्र २४ में यदि उ अ आ २२५' कला का कोण हो तो उ आ का मान २२५', उ इ का २२५' (स्वल्पान्तर से ), अ इ का ३४३१' और इ आ का ७' है। यही इ आ का मान उ अ इ कोण की उत्क्रम ज्या है। इसी प्रकार अन्य पिण्डों की ज्याएं और उत्क्रम ज्याएं जानी जा सकती हैं। मुनयो रन्ध्रयमला रसषट्का मुनीश्वराः । द्व्यष्टैका रूपषड्दस्त्राः सागरेषुहुताशनाः ॥२३॥ ऋर्तुवेदा नवाद्र्यथां दिङ्नागास्त्वथकुञ्जराः । नगाम्बरवियच्चन्द्रा रूपभूधरशङ्कराः ॥२४॥ शरार्णवहुताशैका भुजङ्गाक्षिशरेन्दवः । नवरूपमहीध्रैका गजैकाङ्कनिशाकराः ॥२५॥ गुणाश्विरूपनेत्राणि पावकाग्निगुणाश्विनः । वस्वर्णवार्थयमलास्तुरगर्तु नगाश्विनः ॥२६॥ रन्ध्राष्टनबनेत्राणि पावकैकयमाग्नयः । अष्टाग्निसामरगुणा उत्क्रमज्यार्धपिण्डकाः ॥२७॥ अनुवाद—(२३) ७, २६, ६६, ११७, १८२, २६१, ३५४; (२४) ४६०, ५७६, ७१०, ८५३, १०००, ११७१; (२५) १३४५, १५२८, १७१६, १६१८; (२६) २१२३, २३३३, २५४८, २७६७; (२७) २६८६, ३२१३, और ३४३८ कलाएँ क्रम से उत्क्रम ज्याओं के पिंड हैं। नीचे एक सारिणी दी जाती है जिसमें ऊपर के ग्यारह श्लोकों का सार है :—
१२० सूर्य-सिद्धान्त
| पिंडों का क्रम | धनु अथवा कोण | भारतीय रीति से ज्या के मान जब त्रिज्या = ३४३८ | आजकल की रीति से ज्या के मान जब त्रिज्या = ३४३८ | आजकल की रीति से ज्या के मान जब त्रिज्या = १ | भारतीय रीति से उत्क्रम ज्या के मान जब त्रिज्या = ३४३८ | आजकल की रीति से उत्क्रम ज्या के मान जब त्रिज्या = १ |
|---|---|---|---|---|---|---|
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ |
| १ | ३°४५' | २२५ | २२४.८५ | .०६५४ | ७ | .००२२ |
| २ | ७°३०' | ४४६ | ४४८.६५ | .१३०५ | २६ | .००८६ |
| ३ | ११°१५' | ६७१ | ६७०.७२ | .१९५१ | ६६ | .०१९२ |
| ४ | १५° | ८९० | ८८६.८२ | .२५८८ | ११७ | .०३४१ |
| ५ | १८°४५' | ११०५ | ११०५.०१ | .३२१४ | १८२ | .०५३१ |
| ६ | २२°३०' | १३१५ | १३१५.०५ | .३८२७ | २६१ | .०७६१ |
| ७ | २६°१५' | १५२० | १५२०.५८ | .४४२३ | ३५४ | .१०३१ |
| ८ | ३०°१५' | १७१६ | १७१६.०० | .५००० | ४६० | .१३४० |
| ९ | ३३°४५' | १६१० | १६१०.०५ | .५५५५ | ५७६ | .१६८५ |
| १० | ३७°३०' | २०६३ | २०६३.०५ | .६०८८ | ७१० | .२०६६ |
* देखिये चित्र १ = पृष्ठ १६६ 'विज्ञान' भाग १८ संख्या ५
स्पष्टाधिकार १२१ १ २ ३ ४ ५ ६ ७ ११ ४१° १५' २२६७ २२६७.०२ .६५६४ ८५३ .२४८१ १२ ४५° ० २४३१ २४३१.०१ .७०७१ १००७ .२९२६ १३ ४८° ४५' २५८५ २५८४.७० = .७५१८ ११७१ .३४०६ १४ ५२° ३०' २७२८ २७२७.५५ .७६३४ १३४५ .३६१२ १५ ५६° १५' २८५६ २८५८.५५ .८३१५ १५२८ .४४४५ १६ ६०° ० २९७८ २९७७.३१ .८६६० १७३६ .५००० १७ ६३° ४५' ३०८४ ३०८३.४५ .८६६६ १६१८ .५५७७ १८ ६७° ३०' ३१७७ ३१७६.३७ .६२३६ २१२३ .६१७३ १९ ७१° १५' ३२५६ ३२५५.७५ .६४३६ २३३२ .६७७६ २० ७५° ० ३३२१ ३३२०.८५ .६६५६ २५४८ .७४१२ २१ ७८° ४५' ३३७२ ३३७१.६५ .६८०८ २७६७ .८०४६ २२ ८२° ३०' ३४०६ ३४०८.७५ .६६१४ २६८६ .८६६५ २३ ८६° १५' ३४३१ ३४३०.८५ .६६१८ ३२१३ .६३४६ २४ ६०° ०' ३४३८ ३४३८.०० १.०००० ३४३८ १.००००
१२२ सूर्य सिद्धान्त विज्ञान भाष्य—सूर्य सिद्धान्त में त्रिकोणमिति के इतने ही सम्बन्ध (ratios) दिये हुए हैं। इनसे कोटिज्या (cosine) जानने के लिए यह नियम व्यवहार में लाया गया है कि यदि किसी कोण की ज्या दी हुई हो तो उस कोण को ६०° में से घटाने पर जो कोण होता है उसकी कोटिज्या का मान भी वही होता है अर्थात् किसी कोण की ज्या उसके पूरक कोण की कोटिज्या के समान होती है। किसी कोण की स्पर्श रेखा (tangent) का मान आजकल की तरह नहीं दिया मिलता है, परन्तु इसका व्यवहार अप्रत्यक्ष रूप से कोण की ज्या को उसकी कोटिज्या से भाग देकर किया गया है । यदि कोण का मान ऐसा है कि ऊपर दिये हुए पिंडों के बीच में पड़ता है तो उसकी ज्या, कोटिज्या या उत्क्रमज्या त्रैराशिक (proportional parts) से जानने की विधि अगले ३१-३४ श्लोकों में बतलायी गयी है । इसी प्रकार यदि ज्या का मान ज्ञात हो तो उससे धनु (कोण) निकालने की रीति भी इन्हीं श्लोकों में है । भास्कराचार्य जी ने ज्या, कोटिज्या जानने की रीति और सूक्ष्म रीति से बतलायी है । ज्या के पर्याय क्रमज्या, भुजज्या, बाहुज्या, अर्द्धज्या इत्यादि तथा कोटिज्या के लम्बज्या भी प्रयोग किये गये हैं । परमापक्रमज्या तु सप्तरन्ध्रगुणेन्द्रवः । तद्गुणा ज्या त्रिज्योवाप्ता तच्चापं क्रान्तिरिष्यते ॥२८॥ अनुवाद—(२८) परम क्रान्ति ज्या का मान १३६७ कला है । इसको (भोगांश की) ज्या से गुणा करके, फल को त्रिज्या से भाग देने पर जो आवे वह जिस धनु (कोण) की ज्या हो वही क्रान्ति का मान होता है । स व प चित्र २५
स्पष्टाधिकार १२३ विज्ञान भाष्य—इस श्लोक में दिखलाया गया है कि 'ज्या' का व्यवहार किस प्रकार किया जाता है। साथ ही साथ यह नियम भी बतलाया गया है कि किसी समकोण गोलीय त्रिभुज (Right angled Spherical triangle) के भुजों और कोणों में परस्पर सम्बन्ध क्या होता है। परमक्रान्ति ज्या का मान १३६७ कला बतलाया गया है; जिससे जान पड़ता है कि परमक्रान्ति का मान २४° है; क्योंकि २४° का ज्या का मान ही उपर्युक्त रीति से १३६७ कला होता है; यद्यपि शुद्ध गणना से वह २३°५८'३१'' की ज्या है। दिये हुए चित्र २५ में व वसंत-संपात व स क्रान्तिवृत्त का खंड और व प विषुवद्वृत्त का खंड है। स प ध्रुवप्रोत वृत्त का खंड है अर्थात् उस वृत्त का खंड है जो ध्रुव से होकर जाता है और विषुवद्वृत्त के बिन्दु प पर समकोण बनाता है। स व प कोण क्रान्तिवृत्त और विषुवद्वृत्त के बीच का कोण (obliquity of the eclipt- ic) है जो उपर्युक्त श्लोक के अनुसार २४° है। वसंत संपात से स की दूरी व स क्रान्तिवृत्त के 'स' विन्दु का भोगांश और विषुवद् वृत्त से स की दूरी जबकि स प व कोण समकोण हो, अर्थात् स प, स विन्दु की क्रान्ति कहलाती है। इसी को अपक्रम भी कहते हैं। दिये हुए नियम के अनुसार, ज्या (व स) × १३६७ / ३४३८ = ज्या (सप) अथवा ज्या (व स) × ज्या (स व प) / त्रिज्या = ज्या (सप) यदि त्रिज्या को ३४३८ की जगह १ मान लिया जाय, जैसी कि आजकल की प्रथा है तो १३६७ कला की जगह ˙४०६७ रखना होगा। इससे गुणा भाग में कुछ सरलता हो जायगी और तब इस सूत्र का रूप केवल यह होगा । ज्या (व स) × ज्या (स व प) = ज्या (सप) यही कुछ भेद के साथ आजकल नेपियर के एक नियम से प्रसिद्ध है, जिसे नेपियर* नामक गणितज्ञ ने एडिनबरा से १६१४ ई० अथवा १६७१ वि० में अपने ग्रन्थ 'मिरिफिसी लागेरिथमोरम कैनोनिस डेसक्रिपशिओ' (Mirifici Logarithmo- rum Canonis Descriptio) में प्रकाशित किया था। नेपियर के नियम याद रखने के लिए यह युक्ति है:— *देखो टाडहंटर और लेथेम की गोलीय त्रिभुज (Spherical Trigonom- etry) १९११ की छपी पृष्ठ ५०
१२४ सूर्य-सिद्धान्त किसी समकोण गोलीय त्रिभुज के समकोण को छोड़कर, समकोण बनाने वाली दो भुजाओं, कर्ण के पूरक, तथा अन्य दो कोणों के पूरकों को त्रिभुज के गोल खंड (circular parts) कहते हैं । इस प्रकार किसी समकोण गोलीय त्रिभुज के ५ गोल खंड होते हैं । यह पाँचों खंड एक वृत्त के चारों ओर उसी क्रम से रखे जाते हैं जिस क्रम से रखे जाते हैं । जिस क्रम से यह त्रिभुज में रहते हैं । मान लो अ इ उ एक चित्र २६ गोलीय त्रिभुज है । अ, इ, उ, वह बिन्दु हैं जिन पर त्रिभुज की भुजें इ अ, उ अ; अ इ, उ इ; और अ उ, इ उ मिलती हैं । उ अ इ, अ इ उ और अ उ इ कोणों को संक्षेप में अ, इ, उ अक्षरों से प्रकट करते हैं । इसी तरह अ कोण के सामने वाले भुज इ उ को 'आ' से, इ कोण के सामने वाले भुज अ उ को ई से और उ कोण के सामने वाले भुज अ इ को ऊ से प्रकट करते हैं । साधारण नियम यह है कि त्रिभुज के कोणों को ह्रस्व स्वरों से और उनके सामने के भुजों का उसी प्रकार के दीर्घ स्वरों से प्रकट किया जाता है । गोलीय त्रिभुज के भुजों को भी कोणात्मक मानों से ही नापते हैं । यदि इ समकोण हो तो यह त्रिभुज समकोण गोलीय त्रिभुज कहा जाता है । तब इसके सामने के भुज ई को कर्ण कहते हैं । [ देखिये चित्र २६ ] नेपियर के नियम में समकोण गोलीय त्रिभुज के समकोण को छोड़कर इसके पास वाले दो भुज आ, ऊ, अ कोण का पूरक π/२ - अ, ई कर्ण का पूरक π/२ - ई, उ कोण का पूरक π/२ - उ, गोलीय खंडों को चित्र द्वारा इस प्रकार लिखते हैं [ देखिये चित्र २७ ]
स्पष्टाधिकार १२५ चित्र २७ इन पाँचों में से किसी एक को चुन लो और उसका नाम मध्य खंड रख लो । जिसको मध्य खंड माना उसके बगल के दो खंडों को आसन्न खंड कहो; शेष जो दो खंड रह जाते हैं उनको सन्मुख खंड कहो । अब नेपियर के नियमों को इस प्रकार लिख सकते हैं :— (१) मध्य खंड की ज्या = आसन्न खंडों की स्पर्श रेखाओं का गुणनफल । (२) मध्य खंड की ज्या = संमुख खंडों की कोटिज्याओं का गुणनफल । यही दूसरा नियम उपर्युक्त श्लोक में नेपियर से कम से कम एक हजार वर्ष पहले प्रयोग किया गया है । ग्रहं संशोध्य मन्दोच्चात् तथा शीघ्राद्विशोध्य च । शेषं केन्द्रं पदैस्तस्माद् भुज ज्या कोटिरेव च ॥२६॥ गताद्भुजज्या विषमे गम्यात्कोटिः पदे भवेत् । समे तु गम्याद्बाहुज्या कोटिज्या तु गताद् भवेत् ॥३०॥ अनुवाद--(२६) किसी ग्रह के मन्दोच्च और शीघ्रोच्च के स्थानों में से उसके मध्यम स्थान को घटा देने से जो शेष होते हैं उन्हें क्रम से मन्द केन्द्र और शीघ्र केन्द्र कहते हैं । इनसे पद बनावे और पद जानकर भुज ज्या और
१२६ सूर्य सिद्धान्त
कोटिज्या बनावे । (३०) विषम पद में जो भाग गत रहता है उसकी ज्या को भुज ज्या और जो भाग गम्य होता है उसकी ज्या को कोटिज्या कहते हैं, परन्तु समपद में गम्य भाग की ज्या को भुजज्या और गत भाग की ज्या को कोटि ज्या कहते हैं । विज्ञान भाष्य—इसी अध्याय के चौथे और पाँचवें श्लोकों में बतलाया गया है कि १८०° तक पूर्व में स्थित मन्दोच्च या शीघ्रोच्च अपने ग्रह का मध्यम स्थान से अपनी ओर अर्थात् पूर्व की ओर आसन्नता के अनुसार खींच लेता है, जिससे मध्यम ग्रह में धन संस्कार करने से स्पष्ट ग्रह का स्थान जाना जा सकता है, इत्यादि । ऊपर के २६वें श्लोक में यह बतलाया गया है कि मन्दोच्च या शीघ्रोच्च से मध्यम ग्रह की दूरी कैसे निकालनी चाहिये । किसी परिधि के दो बिन्दुओं का अन्तर दो प्रकार से प्रकट किया जा सकता है। यदि चित्र १५ में उ से तीर की दिशा में चलते हुए म, मा, मि और मी बिन्दुओं के अन्तर नापे जायँ तो यह क्रम से उम; उमा, उमि, और उमी होंगे । परन्तु यदि उ से उलटी दिशा में चलकर इन बिन्दुओं के अन्तर नापे जायँ तो उ से म का अन्तर ३६०°—उम, मा का अन्तर ३६०°—उमा, मि का अन्तर ३६०°—उमि और मी का अन्तर ३६०°—उमी होंगे । चित्र में जो दिशा तीर के अग्र से सूचित होती है उसे संस्कृत ग्रन्थों में अनुलोम या अपसव्य दिशा कहते हैं, आजकल इसको 'धनात्मक' या 'घड़ी की विरुद्ध दिशा' कहते हैं । विषुवत् रेखा से उत्तर में रहने वाले मनुष्यों को सूर्य, चन्द्रमा और ग्रह इत्यादि अपनी कक्षा में इसी दिशा में चलते हुए देख पड़ते हैं । इसके प्रतिकूल दिशा को संस्कृत में विलोम, प्रतिलोम, सव्य तथा आजकल 'ऋणात्मक' या 'घड़ी की दिशा' कहते हैं । पृथ्वी की दैनिक गति के कारण सूर्य, चन्द्रमा, तारे, इत्यादि उत्तर गोल में रहने वाले मनुष्यों को इसी दिशा में चलते हुए जान पड़ते हैं । सूर्य सिद्धान्त में शीघ्रोच्च या मन्दोच्च से ग्रहों का अन्तर जिसे क्रम से शीघ्र केन्द्र या मन्द केन्द्र कहते हैं विलोम या ऋणात्मक दिशा में ही नाप कर जानने की रीति बतलायी गयी है । इसीलिए कहा गया है कि शीघ्रोच्च या मन्दोच्च में से मध्यम ग्रह को घटाना चाहिये । परन्तु ब्रह्मगुप्त, भास्कराचार्य इत्यादि कई अन्य आचार्यों ने मन्दोच्च से मध्यम ग्रह का अन्तर अनुलोम दिशा में और शीघ्रोच्च से मध्यम ग्रह का अन्तर विलोम दिशा में नापने को लिखा है । इसका कारण यह है कि मध्यम ग्रह मन्दोच्च से तीव्रगामी होने के कारण अनुलोम दिशा में ही आगे बढ़ता है और शीघ्रोच्च मध्यम ग्रह से तीव्रगामी होने के कारण अनुलोम दिशा में बढ़ता है; इसलिए मध्यम ग्रह शीघ्रोच्च से विलोम दिशा में जाता है । चाहे जिस तरह मन्द केन्द्र या शीघ्र केन्द्र नापा जाय दोनों का अर्थ एक ही होता है । भास्कराचार्य की रीति स्वाभाविक है और सूर्य सिद्धान्त की कुछ भ्रमजनक ।
स्पष्टाधिकार १२७ जब ग्रह का मन्द केन्द्र और शीघ्र केन्द्र मालूम हो गया तब यह जानने की आवश्यकता पड़ती है कि इनकी ज्या और कोटिज्या क्या हैं, क्योंकि इनकी आगे आवश्यकता पड़ती है। जो लोग आजकल की त्रिकोणमिति से परिचित हैं वह सीधे ही जान सकते हैं क्योंकि उनको मालूम है कि शून्य से ३६०° तक कोज्या, कोटि ज्या इत्यादि कैसे जानी जा सकती हैं। परन्तु प्राचीन काल में शून्य से ३६०° तक के किसी कोण की ज्या निकालने के लिए पहले यह देखते थे कि वह किस पद (quadrant) में है। यदि मन्द केन्द्र या शीघ्र केन्द्र शून्य और ६०° के भीतर हो तो विषम पद में, ६०° के ऊपर परन्तु १८०° से कम हो तो समपद में, १८०° से ऊपर और २७०° से कम हो तो विषम पद में और २७०° से अधिक हो तो समपद में होता है। संक्षेप में पहले और तीसरे पदों को विषम पद तथा दूसरे और चौथे पदों को समपद कहते हैं। यह जानने के लिए कि ग्रह किस पद में है, मन्द केन्द्र या शीघ्र केन्द्र को ६०° से भाग देना चाहिये । यदि लब्धि शून्य या २ आवे तो विषम पद और यदि १ या ३ आवे तो समपद समझना चाहिये । जो शेष बचे वही गत भाग कहलाता है। इस शेष को ६०° में घटा देने से जो आता है उसे गम्य भाग कहते हैं। विषम पद हो
चित्र २८
१२८ सूर्य सिद्धान्त तो गत भाग की ओर सम पद तो तो गम्य भाग की ज्या निकाले। इसी को भुजज्या कहते हैं। परन्तु विषम पद हो तो गम्य भाग की और सम पद हो तो गत भाग की ज्या को कोटि ज्या कहते हैं। यह बात चित्र २८ से सुगमतापूर्वक समझ में आ सकती है। दिया हुआ वृत्त किसी ग्रह का कक्षा वृत्त है। 'उ' शीघ्रोच्च या मन्दोच्च का स्थान है। मी, मि, मा, म किसी ग्रह के मध्यम स्थान हैं। इसलिए विलोम दिशा मे चलते हुए उमी, उमि, उमा और उम ग्रह के मन्द केन्द्र हुए जो क्रम से पहले, दूसरे, तीसरे और चौथे पदों में अथवा विषम, सम, विषम और सम पदों में है। पहले पद में उ मी गत है और मी प गम्य है; इसलिए उ मी की ज्या अर्थात् मी जी को भुज ज्या और मी प की ज्या अर्थात् मी की को कोटि ज्या कहते हैं। दूसरे पद में प मि गत है और मि नी गम्य, इसलिए प मि की ज्या अर्थात् मि कि को कोटि ज्या और मि नी की ज्या अर्थात् मि जि को भुज ज्या कहेंगे। तीसरे पद में 'नी मा' गत और 'मा पू' गम्य है इसलिए नी मा की ज्या अर्थात् मा जा को भुज ज्या और मा पू की ज्या अर्थात् माका को कोटि ज्या कहेंगे। इसी प्रकार चौथे पद में पू म गत है और म उ गम्य, इसलिए पू म की ज्या 'म क' को कोटि ज्या और म उ की ज्या 'म ज' को भुज ज्या कहते हैं। इसको संक्षेप में यों कहना चाहिये कि उच्च से जो रेखा मध्य विन्दु पर होती हुई खींची जाती है उस रेखा से अर्थात् नीचोच्च रेखा से मध्यम ग्रह के अन्तर को भुज ज्या कहते हैं। इस रेखा से समकोण बनाती हुई जो रेखा मध्य विन्दु पर होती हुई जाती है उससे मध्यम ग्रह का जो अन्तर होता है उसे कोटि ज्या कहते हैं। यदि त्रिज्या ३४३८ इकाइयों के समान हो तो इन्हीं इकाइयों में मी जी, मा जा और म ज की जो नाप होंगी उन्हें भुज ज्या और मी की मि कि, मा का, और म क की जो नाप होंगी उन्हें कोटि ज्या कहेंगे। आगे के दो श्लोकों में यह बतलाया गया है कि किसी अंश की ज्या कैसे निकालनी चाहिये। लिप्तास्तत्त्वयमैर्भक्ता लब्धा ज्यापिण्डकं गताः । गतगम्यान्तराभ्यस्तं विभजेत्तत्वलोचनैः ॥३१॥ तदवाप्तफलं योज्यं ज्यापिण्डे गतसंज्ञिते । स्यात्क्रमज्याविधिरेयं उत्क्रमज्यास्वपि स्मृतः ॥३२॥ अनुवाद—(३१) जिस अंश की ज्या जानना हो उसकी कला बना कर २२५ से भाग दे दे, जो लब्धि आवे वही गत ज्या पिण्ड है; जो शेष बचे उसे गत ज्यापिण्ड
स्पष्टाधिकार १२६ और गम्य (अगले) ज्यापिण्ड की ज्याओं के अंतर से गुणा कर दे और गुणनफल को २२५ से भाग दे दे । (३२) जो लब्धि आवे उसे गत ज्यापिण्ड की ज्या में जोड़ देने से जो आवेगा वही इष्ट अंश की ज्या होगी । इसी प्रकार उत्क्रम ज्या भी निकालनी चाहिये । विज्ञान भाष्य—इस अध्याय के १७-२२ श्लोकों में २४ ज्यापिंडों की ज्याएं बतला दी गयी हैं। इनके अतिरिक्त यदि किसी बीच वाले कोण की ज्या जानना हो तो ३१-३२ श्लोकों से जानना चाहिये । मान लो ६६° की ज्या जानना है । पहले यह देखना चाहिये कि ६६° किस पिंड में है । २२५' कला या ३°४५' या ३ ३/४ अंश के अन्तर पर पिंड बाँधे गये हैं, इसलिए ६६° की कला बनाकर २२५ से भाग देना चाहिये अथवा ६६° को ३ ३/४ से भाग देना चाहिये । श्लोक में कला बनाने की ही रीति बतलायी गयी है, इसलिये ६६° = ६६ × ६०' = ३९६०' ३९६०' ÷ २२५ = १७ १३५/२२५ इसलिए गत पिंड १७ और गम्य पिंड १८ है । १८ वें पिंड की ज्या = ३१७७' १७ वें पिंड की ज्या = ३०८४' . गत गम्यान्तर = ९३' अब त्रैराशिक से यह जानना चाहिये कि जब गत और गम्य पिंडों का अंतर २२५ होता है तब इनकी ज्याओं में ९३' का अंतर होता है, इसलिए जब गत पिंड से इष्ट अंश १३५' अधिक है तो गत पिंड की ज्या से इष्ट अंश की ज्या में क्या अंतर होगा । अर्थात् २२५ : १३५ : : ९३ : अभीष्ट अंतर ∴ अभीष्ट अंतर = (१३५ × ९३) / २२५ = (३ × ९३) / ५ = २७९ / ५ = ५६' स्वल्पान्तर से । इसी को गतपिंड की ज्या में अर्थात् ३०८४' में जोड़ देने से ३१४०' हुई । यही ६६° की ज्या है । यदि कोण का मान पूर्ण अंशों में हो तो बिना कला बनाये ही ज्या बनाने में सुभीता होगा, जैसे उपर्युक्त उदाहरण में ६६° की ज्या यों निकाली जा सकती है :— ६
१३० सूर्य-सिद्धान्त ६६° ÷ ३ ३/४ = २२ × ४/५ = ८८/५ = १७ ३/५ १७ वें और १८ वें पिंडों की ज्याओं का अन्तर = ६३' ∵ ६३ × ३/५ = २७६/५ = ५६' १७ वें पिंड की ज्या = ३०८४ ∴ ६६° की ज्या = ३१४० अगले श्लोक में यह बतलाया गया है कि यदि ज्या दी हुई हो तो कोण कैसे जाना जा सकता है । ज्यां प्रोज्भ्यान्यत्तत्त्वयमैर्हत्वा तद्विवरोद्धृतम् । सङ्ख्यातत्त्वाश्विसंवर्गे संयोज्य धनुरुच्यते ॥३३॥ अनुवाद—(३३) यदि यह जानना हो कि दी हुई ज्या किस अंश (धनु) की है तो पहले देखो कि २४ पिंडों की ज्याओं में से सबसे बड़ी कौन है जो दी हुई ज्या में से घटाई जा सकती है । इसी को घटाकर जो शेष आवे उसको २२५ से गुणा करो और गुणनफल को गत और गम्य ज्याओं के अंतर से भाग दे दो, जो लब्धि आवे उसे उस गुणनफल में जोड़ दो जो उस पिंड को २२५ से गुणा करने पर आता है जिस पिंड की ज्या घटायी गयी है । विज्ञान-भाष्य—इस श्लोक में ज्या ज्ञात हो तो कोण जानने की रीति बतलायी गयी है । यह एक उदाहरण से स्पष्ट हो जायगी । मान लो किसी कोण की ज्या ३१४०' है, अब यह जानना है कि कोण क्या है । १७—२२ श्लोकों के अनुसार १७वें पिंड की ज्या ३०८४' और १८वें पिंड की ज्या ३१७७' है । इसलिए ३१४०' में से ३०८४' घटाया तो शेष बचा ५६' । गत, गम्य पिंडों की ज्याओं का अंतर ६३' है, ६३' : ५६' : : २२५' : इष्ट कला ∵ इष्टकला = (५६ × २२५)/६३ = ४२००/३१ = १३५' स्वल्पान्तर से १७वें पिंड की कला = १७ × २२५ = ३८२५' ∴ दोनों का योगफल = ३९६०' ∵ जिस कोण की ज्या ३१४०' है वह ३९६०' अथवा ६६° है ।
स्पष्टाधिकार १३१ रवेर्मन्दपरिध्यंशा मानवश्शीतगो रदाः । युग्मान्ते विषमान्ते च नखलिप्तोनितास्तयोः ॥३४॥ युग्मान्तेऽर्थाद्रयः खाग्निः सुरास्सूर्या नवार्णवाः । ओजे द्व्यगा वसुयमा रदा रुद्रा गजाब्धयः ॥३५॥ कुजादीनां ततश्शीघ्रा युग्मान्तेऽर्थाग्निदस्त्रकाः । गुणाग्निचन्द्राः खागाश्च द्विरसाक्षीणि गोऽग्नयः ॥३६॥ ओजान्ते द्वित्रिकयमाः द्विविश्वे यमपर्वताः । खर्तुदस्रा वियद्वेदाश्शीघ्रकर्मणि कीर्तिताः ॥३७॥ अनुवाद—(३४) सम पदों के अंत में सूर्य की मंद परिधि १४° और चन्द्रमा की ३२° होती है । विषम पदों के अंत में प्रत्येक की मंद परिधि २० कला कम होती है । (३५) मंगल, बुध, गुरु, शुक्र और शनि की मन्द परिधियाँ समपदों के अन्त में क्रम से ७५°, ३०°, ३३°, १२° और ४६° तथा विषम पदों के अंत में क्रम से ७२°, २८°, ३२°, ११°, और ४८° होती हैं । (३६) इन पाँच ग्रहों की शीघ्र परिधियाँ समपदों के अन्त में क्रम से २३५°, १३३°, ७०°, २६२°, और ३६° तथा (३७) विषमपदों के अंत में २३२°, १३२°, ७२°, २६०° और ४०° होती हैं जो शीघ्र कर्म के लिए कही गयी हैं ।
[चित्र: उ, स, म, प] चित्र २६
१३२ सूर्य-सिद्धान्त
विज्ञान भाष्य—मन्दोच्च के कारण ग्रह के मध्यम और स्पष्ट स्थानों में जो अंतर होता है वह मन्द फल और मन्द फल ओर शीघ्रोच्च के कारण मध्यम और स्पष्ट स्थानों में जो अन्तर होता है वह शीघ्र फल कहलाता है । यह मन्दोच्च या शीघ्रोच्च की दूरी के अनुसार घटता बढ़ता है । मध्यम और स्पष्ट ग्रहों में जो सबसे अधिक अंतर होता है वह मन्दोच्च के कारण हुआ तो परम मन्द फल और शीघ्रोच्च के कारण हुआ तो परम शीघ्र फल कहलाता है । यह वेध से अर्थात् नलिका यंत्र द्वारा देखने से जाना जाता है । परम मन्द फल की ज्या को अर्द्धव्यास मानकर जो परिधि खींची जाती है उसे मन्दपरिधि कहते हैं । इसी तरह परम शीघ्र फल की ज्या को अर्द्धव्यास मानकर जो परिधि खींची जाती है उसे शीघ्र परिधि या चला परिधि भी कहते हैं । यदि एक वृत्त खींचकर उसके मध्य में पृथ्वी मान ली जाय और परिधि पर मध्यम ग्रह भ्रमण करता हुआ माना जाय तो परिधि को ग्रह का कक्षावृत्त या कक्षामण्डल कहते हैं । यदि इस कक्षावृत्त के ३६० समान भाग किये जायें तो ऐसे १४ भागों के समान सूर्य की मंद परिधि का विस्तार, समपदों के अंत में होगा । ऐसे ही अन्य ग्रहों की मन्द और शीघ्र परिधियों के परिमाण के बारे में समझना चाहिये । इसे यों भी लिख सकते हैं कि सूर्य की मन्द परिधि कक्षावृत्त का १४/३६० होती है । चित्र २६ में यदि प पृथ्वी का स्थान, उ म स किसी ग्रह का कक्षावृत्त तथा म ओर स उसके मध्यम और स्पष्ट स्थान हों जबकि मस का मान परम हो तो मस धनु को ग्रह का परम मन्द फल तथा इसकी ज्या को जो मस के बीच की रेखात्मक दूरी है परम मन्द फल ज्या कहते हैं । मस को अर्द्धव्यास और म को मध्य मानकर जो छोटी परिधि खींची गयी है वह मन्द परिधि है । यदि कक्षा वृत्त का विस्तार ३६० भाग माना जाय तो ऐसे जितने भाग के समान मंदपरिधि का विस्तार होता है उतने ही अंश की वह परिधि कहलाती है । इसी प्रकार शीघ्र परिधि की लम्बाई के बारे में समझना चाहिये । यह परिमाण भी भिन्न भिन्न आचार्यों के मत से भिन्न-भिन्न हैं । इसका कारण यह है कि परम मंद फल का मान सर्वदा एकसा नहीं रहता, शनैः शनैः बदलता जा रहा है । सूर्य का परम मन्द फल एक हजार वर्ष में ३ कला घटता जा रहा है । इस समय सूर्य का परम मंद फल १°५५' है । सूर्य सिद्धान्त में सूर्य का परम मंद फल २°१३'४१'' है । इसमें वेध की स्थूलता के कारण भी अशुद्धि है । ओजयुग्मान्तरगुणा भुजज्या त्रिज्ययोद्धृता । युग्मे वृत्ते धनर्णं स्यादोजादूनाधिके स्फुटम् ॥३८॥ अनुवाद—(३८) विषम और समपदों के अंत की मन्द या शीघ्रपरिधियों के अंतर को मंद केन्द्र या शीघ्रकेन्द्र की भुज ज्या से गुणा करके त्रिज्या से भाग दे दो ।
स्पष्टाधिकार १३३ यदि मन्दकेन्द्र या शीघ्र केन्द्र समपद में हो और विषम पद के अंत की मन्द या शीघ्र परिधि से समपद के अंत की मंद या शीघ्र परिधि कम हो तो उस लब्धि को समपदान्त परिधि में जोड़ दो तो इष्ट केन्द्र की स्फुट मंद या शीघ्र परिधि होगी । परन्तु यदि विषमपद के अंत की परिधि से अधिक हो तो उस लब्धि को सम पदान्त परिधि में घटा देने से स्फुट परिधि निकल आवेगी । विज्ञान-भाष्य- सूर्य सिद्धान्त का मत है कि मन्द परिधि या शीघ्र परिधि का मान मन्दकेन्द्र या शीघ्रकेन्द्र की भुज ज्या के अनुसार बदलता रहता है । किस जगह इसका परिमाण क्या है यह त्रैराशिक से निकालना चाहिए क्योंकि यह दिया हुआ कि सम और विषम पदों के अंत में इसके मान क्या हैं । बीच के किसी स्थान के मान को जानने के लिए यह तर्क करना चाहिए कि जब त्रिज्या (भुज ज्या का परम मान) के अंतर पर परिधियों का अंतर दिया हुआ है तो इष्ट केन्द्र की भुज ज्या के अंतर पर कितना होगा । इस नियम को संक्षेप में यों लिख सकते हैं— स्फुट मंद परिधि =मंद परिधि±विषम और सम पदों के अंत की परिधियों- का अंतर X इष्ट केन्द्र की भुज ज्या / त्रिज्या जैसे सूर्य की समपदान्त मन्द परिधि ८४०', विषम और समपदान्तों के मंद परिधियों का अन्तर २०' है, इसलिए यदि अभीष्ट मन्द केन्द्र 'अ' हो तो स्फुट मन्द परिधि होगी ८४०' - २०' X अ की भुज ज्या / ३४३८' क्योंकि समपदान्त मन्द परिधि अधिक है । इसी तरह अन्य ग्रहों की स्फुट मन्द परिधि तथा शीघ्र परिधि निकालनी चाहिए । तद्गुणे भुजकोटिज्ये भगणांश विभाजिते । तद्भुजज्याफलधनुः मान्दं लिप्तादिकं फलम् ॥३६॥ अनुवाद-(३६) स्फुट मन्द परिधि को क्रम से भुज ज्या और कोटि ज्या से गुणा करके ३६० से (यदि स्फुट मन्द परिधि अंशों में हो) या २१६०० से (यदि स्फुट मन्द परिधि कलाओं में हो) भाग दे दो । लब्धि क्रम से भुजफल और कोटिफल (कलाओं में) होंगी । भुजफल जिस धनु (कोण) की ज्या होगी उसे ही मन्द फल कहते हैं । विज्ञान भाष्य- इस नियम को संक्षेप में यों लिख सकते हैं :—
१३४ सूर्य सिद्धान्त भुज फल = स्फुट मन्द परिधि × भुज ज्या ३६० कोटि फल = स्फुट मन्द परिधि × कोटि ज्या ३६० भुज फल जिस अंश (धनु) की ज्या हो वही मन्द फल कहलाता है । उपर्युक्त समीकरणों में ३६० उसी समय होगा जब कि मन्द परिधि अंशों में हो । यदि मन्द परिधि कलाओं में हो तो ३६० की जगह २१६०० रखना होगा । इसकी उपपत्ति यों है :—ग्रह के मध्य और स्पष्ट स्थानों का अंतर क्या होता है यह जानने के लिए हमारे आचार्यों ने यह कल्पना की थी कि मध्यम ग्रह तो सदैव समान गति से अनुलोम दिशा में पृथ्वी की परिक्रमा करता रहता है और स्पष्ट ग्रह मन्द परिधि पर जिसके मध्य में मध्यम ग्रह रहता है, विलोम दिशा में इस प्रकार चल रहा है कि जितने समय में मध्यम ग्रह अपनी कक्षा में (कक्षावृत्त में) पूरा- चक्कर कर लेता है, उतने ही समय में स्पष्ट ग्रह मन्द परिधि पर अपना चक्कर कर लेता है। मन्द परिधि पर चक्कर लगाते हुए स्पष्ट ग्रह कक्षावृत्त में जहाँ देख पड़ता है उसी विन्दु को स्पष्ट ग्रह का स्थान कहते हैं। यह बात चित्र ३० से भली भाँति समझ में आ जायगी । इसमें प पृथ्वी का केन्द्र है। 'प को केन्द्र मान कर पम त्रिज्या से जो बड़ा वृत्त खींचा गया है वह कक्षावृत्त कहलाता है। इसी कक्षावृत्त पर मध्यम ग्रह अनुलोम दिशा में मध्यम गति से भ्रमण करता हुआ माना गया है । म, मा, मि, मी, मु, मू, मे, मै, मध्यम ग्रह के आठ स्थान हैं म वह स्थान है जहाँ मध्यम और स्पष्ट ग्रहों का अंतर शून्य होता है । अर्थात् इसी दिशा में ग्रह का मन्दोच्च होता है । कक्षा वृत्त में इसी जगह १ लिखा हुआ है और स भी लिखा हुआ है जिससे प्रकट होता है कि यहीं मध्यम और स्पष्ट ग्रह एकसाथ होते हैं और इसी जगह से आरम्भ करके कक्षावृत्त अनुलोम दिशा में तीन-तीन राशि के अंतर पर चार पदों में बाँटा गया है । इसीलिए पहले पद के अंत में ४, दूसरे पद के अंत में ७ और तीसरे पद के अंत में १० के अंक लिखे गये हैं । म; मा, मि, इत्यादि मध्यम ग्रह के स्थानों को मध्यम मानकर ग्रह की मन्द परिधि के मानानुसार जो छोटे-छोटे वृत्त खींचे गये हैं वही स्फुट मन्द परिधि है। चित्र को स्पष्ट करने के लिए स्फुट मन्द परिधि और कक्षा वृत्त के विस्तार उसी अनुपात में नहीं दिखाये गये हैं, जिस अनुपात में यह प्रत्यक्ष देखे जाते हैं अथवा ग्रन्थों में दिये है । मंद परिधि कुछ बढ़ाकर खींची गयी है। सूर्य सिद्धान्त के अनुसार इस स्फुट मन्द परिधियों के मान भी सर्वत्र समान नहीं होते । प म, प मा, प मि इत्यादि रेखाएँ मंद परिधि के दूर वाले विन्दु पर जहाँ पहुँचती है वहाँ भी मंद परिधि पर १ के अंक लिखे हुए हैं। यहाँ से आरंभ करके मंद परिधि