भारतकोश
सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)

सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)

Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary

भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा

DevanagariHindipublished838 पृष्ठ

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स्पष्टाधिकार १२५ चित्र २७ इन पाँचों में से किसी एक को चुन लो और उसका नाम मध्य खंड रख लो । जिसको मध्य खंड माना उसके बगल के दो खंडों को आसन्न खंड कहो; शेष जो दो खंड रह जाते हैं उनको सन्मुख खंड कहो । अब नेपियर के नियमों को इस प्रकार लिख सकते हैं :— (१) मध्य खंड की ज्या = आसन्न खंडों की स्पर्श रेखाओं का गुणनफल । (२) मध्य खंड की ज्या = संमुख खंडों की कोटिज्याओं का गुणनफल । यही दूसरा नियम उपर्युक्त श्लोक में नेपियर से कम से कम एक हजार वर्ष पहले प्रयोग किया गया है । ग्रहं संशोध्य मन्दोच्चात् तथा शीघ्राद्विशोध्य च । शेषं केन्द्रं पदैस्तस्माद् भुज ज्या कोटिरेव च ॥२६॥ गताद्भुजज्या विषमे गम्यात्कोटिः पदे भवेत् । समे तु गम्याद्बाहुज्या कोटिज्या तु गताद् भवेत् ॥३०॥ अनुवाद--(२६) किसी ग्रह के मन्दोच्च और शीघ्रोच्च के स्थानों में से उसके मध्यम स्थान को घटा देने से जो शेष होते हैं उन्हें क्रम से मन्द केन्द्र और शीघ्र केन्द्र कहते हैं । इनसे पद बनावे और पद जानकर भुज ज्या और