भारतकोश
सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)

सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)

Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary

भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा

DevanagariHindipublished838 पृष्ठ

पृष्ठ 149, कुल 838 में से

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१२६ सूर्य सिद्धान्त

कोटिज्या बनावे । (३०) विषम पद में जो भाग गत रहता है उसकी ज्या को भुज ज्या और जो भाग गम्य होता है उसकी ज्या को कोटिज्या कहते हैं, परन्तु समपद में गम्य भाग की ज्या को भुजज्या और गत भाग की ज्या को कोटि ज्या कहते हैं । विज्ञान भाष्य—इसी अध्याय के चौथे और पाँचवें श्लोकों में बतलाया गया है कि १८०° तक पूर्व में स्थित मन्दोच्च या शीघ्रोच्च अपने ग्रह का मध्यम स्थान से अपनी ओर अर्थात् पूर्व की ओर आसन्नता के अनुसार खींच लेता है, जिससे मध्यम ग्रह में धन संस्कार करने से स्पष्ट ग्रह का स्थान जाना जा सकता है, इत्यादि । ऊपर के २६वें श्लोक में यह बतलाया गया है कि मन्दोच्च या शीघ्रोच्च से मध्यम ग्रह की दूरी कैसे निकालनी चाहिये । किसी परिधि के दो बिन्दुओं का अन्तर दो प्रकार से प्रकट किया जा सकता है। यदि चित्र १५ में उ से तीर की दिशा में चलते हुए म, मा, मि और मी बिन्दुओं के अन्तर नापे जायँ तो यह क्रम से उम; उमा, उमि, और उमी होंगे । परन्तु यदि उ से उलटी दिशा में चलकर इन बिन्दुओं के अन्तर नापे जायँ तो उ से म का अन्तर ३६०°—उम, मा का अन्तर ३६०°—उमा, मि का अन्तर ३६०°—उमि और मी का अन्तर ३६०°—उमी होंगे । चित्र में जो दिशा तीर के अग्र से सूचित होती है उसे संस्कृत ग्रन्थों में अनुलोम या अपसव्य दिशा कहते हैं, आजकल इसको 'धनात्मक' या 'घड़ी की विरुद्ध दिशा' कहते हैं । विषुवत् रेखा से उत्तर में रहने वाले मनुष्यों को सूर्य, चन्द्रमा और ग्रह इत्यादि अपनी कक्षा में इसी दिशा में चलते हुए देख पड़ते हैं । इसके प्रतिकूल दिशा को संस्कृत में विलोम, प्रतिलोम, सव्य तथा आजकल 'ऋणात्मक' या 'घड़ी की दिशा' कहते हैं । पृथ्वी की दैनिक गति के कारण सूर्य, चन्द्रमा, तारे, इत्यादि उत्तर गोल में रहने वाले मनुष्यों को इसी दिशा में चलते हुए जान पड़ते हैं । सूर्य सिद्धान्त में शीघ्रोच्च या मन्दोच्च से ग्रहों का अन्तर जिसे क्रम से शीघ्र केन्द्र या मन्द केन्द्र कहते हैं विलोम या ऋणात्मक दिशा में ही नाप कर जानने की रीति बतलायी गयी है । इसीलिए कहा गया है कि शीघ्रोच्च या मन्दोच्च में से मध्यम ग्रह को घटाना चाहिये । परन्तु ब्रह्मगुप्त, भास्कराचार्य इत्यादि कई अन्य आचार्यों ने मन्दोच्च से मध्यम ग्रह का अन्तर अनुलोम दिशा में और शीघ्रोच्च से मध्यम ग्रह का अन्तर विलोम दिशा में नापने को लिखा है । इसका कारण यह है कि मध्यम ग्रह मन्दोच्च से तीव्रगामी होने के कारण अनुलोम दिशा में ही आगे बढ़ता है और शीघ्रोच्च मध्यम ग्रह से तीव्रगामी होने के कारण अनुलोम दिशा में बढ़ता है; इसलिए मध्यम ग्रह शीघ्रोच्च से विलोम दिशा में जाता है । चाहे जिस तरह मन्द केन्द्र या शीघ्र केन्द्र नापा जाय दोनों का अर्थ एक ही होता है । भास्कराचार्य की रीति स्वाभाविक है और सूर्य सिद्धान्त की कुछ भ्रमजनक ।

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