सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)
Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary
भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा
पृष्ठ 150, कुल 838 में से
संदर्भ में पढ़ेंस्पष्टाधिकार १२७ जब ग्रह का मन्द केन्द्र और शीघ्र केन्द्र मालूम हो गया तब यह जानने की आवश्यकता पड़ती है कि इनकी ज्या और कोटिज्या क्या हैं, क्योंकि इनकी आगे आवश्यकता पड़ती है। जो लोग आजकल की त्रिकोणमिति से परिचित हैं वह सीधे ही जान सकते हैं क्योंकि उनको मालूम है कि शून्य से ३६०° तक कोज्या, कोटि ज्या इत्यादि कैसे जानी जा सकती हैं। परन्तु प्राचीन काल में शून्य से ३६०° तक के किसी कोण की ज्या निकालने के लिए पहले यह देखते थे कि वह किस पद (quadrant) में है। यदि मन्द केन्द्र या शीघ्र केन्द्र शून्य और ६०° के भीतर हो तो विषम पद में, ६०° के ऊपर परन्तु १८०° से कम हो तो समपद में, १८०° से ऊपर और २७०° से कम हो तो विषम पद में और २७०° से अधिक हो तो समपद में होता है। संक्षेप में पहले और तीसरे पदों को विषम पद तथा दूसरे और चौथे पदों को समपद कहते हैं। यह जानने के लिए कि ग्रह किस पद में है, मन्द केन्द्र या शीघ्र केन्द्र को ६०° से भाग देना चाहिये । यदि लब्धि शून्य या २ आवे तो विषम पद और यदि १ या ३ आवे तो समपद समझना चाहिये । जो शेष बचे वही गत भाग कहलाता है। इस शेष को ६०° में घटा देने से जो आता है उसे गम्य भाग कहते हैं। विषम पद हो
चित्र २८