भारतकोश
सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)

सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)

Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary

भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा

DevanagariHindipublished838 पृष्ठ

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१२८ सूर्य सिद्धान्त तो गत भाग की ओर सम पद तो तो गम्य भाग की ज्या निकाले। इसी को भुजज्या कहते हैं। परन्तु विषम पद हो तो गम्य भाग की और सम पद हो तो गत भाग की ज्या को कोटि ज्या कहते हैं। यह बात चित्र २८ से सुगमतापूर्वक समझ में आ सकती है। दिया हुआ वृत्त किसी ग्रह का कक्षा वृत्त है। 'उ' शीघ्रोच्च या मन्दोच्च का स्थान है। मी, मि, मा, म किसी ग्रह के मध्यम स्थान हैं। इसलिए विलोम दिशा मे चलते हुए उमी, उमि, उमा और उम ग्रह के मन्द केन्द्र हुए जो क्रम से पहले, दूसरे, तीसरे और चौथे पदों में अथवा विषम, सम, विषम और सम पदों में है। पहले पद में उ मी गत है और मी प गम्य है; इसलिए उ मी की ज्या अर्थात् मी जी को भुज ज्या और मी प की ज्या अर्थात् मी की को कोटि ज्या कहते हैं। दूसरे पद में प मि गत है और मि नी गम्य, इसलिए प मि की ज्या अर्थात् मि कि को कोटि ज्या और मि नी की ज्या अर्थात् मि जि को भुज ज्या कहेंगे। तीसरे पद में 'नी मा' गत और 'मा पू' गम्य है इसलिए नी मा की ज्या अर्थात् मा जा को भुज ज्या और मा पू की ज्या अर्थात् माका को कोटि ज्या कहेंगे। इसी प्रकार चौथे पद में पू म गत है और म उ गम्य, इसलिए पू म की ज्या 'म क' को कोटि ज्या और म उ की ज्या 'म ज' को भुज ज्या कहते हैं। इसको संक्षेप में यों कहना चाहिये कि उच्च से जो रेखा मध्य विन्दु पर होती हुई खींची जाती है उस रेखा से अर्थात् नीचोच्च रेखा से मध्यम ग्रह के अन्तर को भुज ज्या कहते हैं। इस रेखा से समकोण बनाती हुई जो रेखा मध्य विन्दु पर होती हुई जाती है उससे मध्यम ग्रह का जो अन्तर होता है उसे कोटि ज्या कहते हैं। यदि त्रिज्या ३४३८ इकाइयों के समान हो तो इन्हीं इकाइयों में मी जी, मा जा और म ज की जो नाप होंगी उन्हें भुज ज्या और मी की मि कि, मा का, और म क की जो नाप होंगी उन्हें कोटि ज्या कहेंगे। आगे के दो श्लोकों में यह बतलाया गया है कि किसी अंश की ज्या कैसे निकालनी चाहिये। लिप्तास्तत्त्वयमैर्भक्ता लब्धा ज्यापिण्डकं गताः । गतगम्यान्तराभ्यस्तं विभजेत्तत्वलोचनैः ॥३१॥ तदवाप्तफलं योज्यं ज्यापिण्डे गतसंज्ञिते । स्यात्क्रमज्याविधिरेयं उत्क्रमज्यास्वपि स्मृतः ॥३२॥ अनुवाद—(३१) जिस अंश की ज्या जानना हो उसकी कला बना कर २२५ से भाग दे दे, जो लब्धि आवे वही गत ज्या पिण्ड है; जो शेष बचे उसे गत ज्यापिण्ड