भारतकोश
सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)

सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)

Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary

भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा

DevanagariHindipublished838 पृष्ठ

पृष्ठ 152, कुल 838 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 152

स्पष्टाधिकार १२६ और गम्य (अगले) ज्यापिण्ड की ज्याओं के अंतर से गुणा कर दे और गुणनफल को २२५ से भाग दे दे । (३२) जो लब्धि आवे उसे गत ज्यापिण्ड की ज्या में जोड़ देने से जो आवेगा वही इष्ट अंश की ज्या होगी । इसी प्रकार उत्क्रम ज्या भी निकालनी चाहिये । विज्ञान भाष्य—इस अध्याय के १७-२२ श्लोकों में २४ ज्यापिंडों की ज्याएं बतला दी गयी हैं। इनके अतिरिक्त यदि किसी बीच वाले कोण की ज्या जानना हो तो ३१-३२ श्लोकों से जानना चाहिये । मान लो ६६° की ज्या जानना है । पहले यह देखना चाहिये कि ६६° किस पिंड में है । २२५' कला या ३°४५' या ३ ३/४ अंश के अन्तर पर पिंड बाँधे गये हैं, इसलिए ६६° की कला बनाकर २२५ से भाग देना चाहिये अथवा ६६° को ३ ३/४ से भाग देना चाहिये । श्लोक में कला बनाने की ही रीति बतलायी गयी है, इसलिये ६६° = ६६ × ६०' = ३९६०' ३९६०' ÷ २२५ = १७ १३५/२२५ इसलिए गत पिंड १७ और गम्य पिंड १८ है । १८ वें पिंड की ज्या = ३१७७' १७ वें पिंड की ज्या = ३०८४' . गत गम्यान्तर = ९३' अब त्रैराशिक से यह जानना चाहिये कि जब गत और गम्य पिंडों का अंतर २२५ होता है तब इनकी ज्याओं में ९३' का अंतर होता है, इसलिए जब गत पिंड से इष्ट अंश १३५' अधिक है तो गत पिंड की ज्या से इष्ट अंश की ज्या में क्या अंतर होगा । अर्थात् २२५ : १३५ : : ९३ : अभीष्ट अंतर ∴ अभीष्ट अंतर = (१३५ × ९३) / २२५ = (३ × ९३) / ५ = २७९ / ५ = ५६' स्वल्पान्तर से । इसी को गतपिंड की ज्या में अर्थात् ३०८४' में जोड़ देने से ३१४०' हुई । यही ६६° की ज्या है । यदि कोण का मान पूर्ण अंशों में हो तो बिना कला बनाये ही ज्या बनाने में सुभीता होगा, जैसे उपर्युक्त उदाहरण में ६६° की ज्या यों निकाली जा सकती है :— ६