सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)
Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary
भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१३० सूर्य-सिद्धान्त ६६° ÷ ३ ३/४ = २२ × ४/५ = ८८/५ = १७ ३/५ १७ वें और १८ वें पिंडों की ज्याओं का अन्तर = ६३' ∵ ६३ × ३/५ = २७६/५ = ५६' १७ वें पिंड की ज्या = ३०८४ ∴ ६६° की ज्या = ३१४० अगले श्लोक में यह बतलाया गया है कि यदि ज्या दी हुई हो तो कोण कैसे जाना जा सकता है । ज्यां प्रोज्भ्यान्यत्तत्त्वयमैर्हत्वा तद्विवरोद्धृतम् । सङ्ख्यातत्त्वाश्विसंवर्गे संयोज्य धनुरुच्यते ॥३३॥ अनुवाद—(३३) यदि यह जानना हो कि दी हुई ज्या किस अंश (धनु) की है तो पहले देखो कि २४ पिंडों की ज्याओं में से सबसे बड़ी कौन है जो दी हुई ज्या में से घटाई जा सकती है । इसी को घटाकर जो शेष आवे उसको २२५ से गुणा करो और गुणनफल को गत और गम्य ज्याओं के अंतर से भाग दे दो, जो लब्धि आवे उसे उस गुणनफल में जोड़ दो जो उस पिंड को २२५ से गुणा करने पर आता है जिस पिंड की ज्या घटायी गयी है । विज्ञान-भाष्य—इस श्लोक में ज्या ज्ञात हो तो कोण जानने की रीति बतलायी गयी है । यह एक उदाहरण से स्पष्ट हो जायगी । मान लो किसी कोण की ज्या ३१४०' है, अब यह जानना है कि कोण क्या है । १७—२२ श्लोकों के अनुसार १७वें पिंड की ज्या ३०८४' और १८वें पिंड की ज्या ३१७७' है । इसलिए ३१४०' में से ३०८४' घटाया तो शेष बचा ५६' । गत, गम्य पिंडों की ज्याओं का अंतर ६३' है, ६३' : ५६' : : २२५' : इष्ट कला ∵ इष्टकला = (५६ × २२५)/६३ = ४२००/३१ = १३५' स्वल्पान्तर से १७वें पिंड की कला = १७ × २२५ = ३८२५' ∴ दोनों का योगफल = ३९६०' ∵ जिस कोण की ज्या ३१४०' है वह ३९६०' अथवा ६६° है ।