सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)
Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary
भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२६७८, ३०८४, ३१७७; (२१) ३२५६, ३३२१, ३३७२, ३४०६; (२२) ३४३१, ३४३८ कलाएं क्रम से ३¾ अंश, ७½ अंश, ११¼ अंश, १५ अंश इत्यादि एक समकोण के २४ पिंडों की ज्याएं हैं। यदि इनको उलटे क्रम से (उत्क्रम से) एक त्रिज्या की कलाओं से अर्थात् ३४३८ से घटा दो तो एक समकोण के २४ पिंडों की क्रम से उत्क्रम ज्याएं ज्ञात हो जायंगी । इनके मान भी आगे के पांच श्लोकों में दिये हुए हैं । विज्ञान भाष्य - इस सम्बन्ध में अधिक कहने की आवश्यकता नहीं जान पड़ती है। अगले पांच श्लोकों के बाद इन ज्याओं और उत्क्रम ज्याओं के मानों की तुलना आजकल की रीति से निकाले हुए मानों से की जायगी। उत्क्रम ज्या के मान जानने के लिए जो नियम लिखा गया है वह बहुत ही सरल और मौलिक है। यदि ३४३८ में से अंतिम संख्या ३४३८ घटायी जाय तो शून्य बचेगा जो शून्य अंश की उत्क्रम ज्या है और यदि ३४३१ घटाया जाय तो ७ बचेगा जो २२५ कला की उत्क्रम ज्या है। इसको रेखागणित के आधार पर इस प्रकार जान सकते हैं—चित्र २४ में यदि उ अ आ २२५' कला का कोण हो तो उ आ का मान २२५', उ इ का २२५' (स्वल्पान्तर से ), अ इ का ३४३१' और इ आ का ७' है। यही इ आ का मान उ अ इ कोण की उत्क्रम ज्या है। इसी प्रकार अन्य पिण्डों की ज्याएं और उत्क्रम ज्याएं जानी जा सकती हैं। मुनयो रन्ध्रयमला रसषट्का मुनीश्वराः । द्व्यष्टैका रूपषड्दस्त्राः सागरेषुहुताशनाः ॥२३॥ ऋर्तुवेदा नवाद्र्यथां दिङ्नागास्त्वथकुञ्जराः । नगाम्बरवियच्चन्द्रा रूपभूधरशङ्कराः ॥२४॥ शरार्णवहुताशैका भुजङ्गाक्षिशरेन्दवः । नवरूपमहीध्रैका गजैकाङ्कनिशाकराः ॥२५॥ गुणाश्विरूपनेत्राणि पावकाग्निगुणाश्विनः । वस्वर्णवार्थयमलास्तुरगर्तु नगाश्विनः ॥२६॥ रन्ध्राष्टनबनेत्राणि पावकैकयमाग्नयः । अष्टाग्निसामरगुणा उत्क्रमज्यार्धपिण्डकाः ॥२७॥ अनुवाद—(२३) ७, २६, ६६, ११७, १८२, २६१, ३५४; (२४) ४६०, ५७६, ७१०, ८५३, १०००, ११७१; (२५) १३४५, १५२८, १७१६, १६१८; (२६) २१२३, २३३३, २५४८, २७६७; (२७) २६८६, ३२१३, और ३४३८ कलाएँ क्रम से उत्क्रम ज्याओं के पिंड हैं। नीचे एक सारिणी दी जाती है जिसमें ऊपर के ग्यारह श्लोकों का सार है :—