भारतकोश
सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)

सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)

Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary

भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा

DevanagariHindipublished838 पृष्ठ

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स्पष्टाधिकार १३५ चित्र ३० पर तीन तीन राशि या नब्बे नब्बे अंश के अंतर पर विलोम दिशा में ४, ७, १० के अंक लिखे गये हैं । जिस समय मध्यम ग्रह म पर होता है उस समय स्पष्ट ग्रह मंद परिधि के उस विन्दु पर रहता है जहाँ १ लिखा हुआ है । यही ग्रह के मन्दोच्च का स्थान है; इसलिए वहाँ उ भी लिखा हुआ है । जितने समय में मध्यम ग्रह कक्षावृत्त पर म से मा तक जाता है उतने समय में स्पष्ट ग्रह मंद परिधि पर १ से गा तक जाता है; क्योंकि मध्यम ग्रह का कक्षावृत्त पर और स्पष्ट ग्रह का मंद वृत्त (मंद परिधि को मंद वृत्त भी कहते हैं) पर कोणीय वेग समान होता है, इसलिए मागा रेखा पम रेखा के जिसको नीचोच्च रेखा कहते हैं समानान्तर होती है । गा और प को मिलाने वाली रेखा को मंदकर्ण कहते हैं । यही पृथ्वी के मध्य से स्पष्ट ग्रह की दूरी होती है । यह मंदकर्ण कक्षा वृत्त को सा बिन्दु पर काटता है, इसलिए स्पष्ट ग्रह कक्षावृत्त में सा बिन्दु पर ही देख पड़ता है । इसी विन्दु को स्पष्ट ग्रह का स्थान कहते हैं । सामा धनु अथवा सा प मा कोण को मंद फल कहते हैं । म मा धनु अथवा म प मा कोण को मन्द केन्द्र, म सा धनु अथवा म प सा को स्पष्ट केन्द्र कहते हैं; इसलिए स्पष्ट केन्द्र और मन्द केन्द्र का अंतर मंद फल कहलाता है । मा से नीचोच्च