सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)
Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary
भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१४२ सूर्य सिद्धान्त मध्ये शीघ्रफलस्यार्धं मान्दमर्धफलं तथा। मध्यंग्रहे मन्दफलं सकलं शैघ्ग्रमेव च ॥४४॥ अनुवाद—(४४) मध्यम ग्रह को शीघ्रोच्च में से घटा कर शीघ्र केन्द्र और इससे शीघ्रफल निकाले । इस शीघ्रफल का आधा मध्यम ग्रह में जोड़े (यदि शीघ्र केन्द्र ६ राशि से कम हो) और घटावे (यदि शीघ्र केन्द्र ६ राशि से अधिक हो); जोड़ने या घटाने से जो आता है वही प्रथम संस्कार युक्त मध्यम ग्रह कहलाता है। इस प्रथम संस्कार युक्त मध्यम ग्रह को मन्दोच्च में से घटावे, शेष को मन्द केन्द्र समझ कर, मंद फल बनावे । इस मंद फल का आधा, प्रथम संस्कार युक्त मध्यम ग्रह में जोड़ने या घटाने से जो आता है वही द्वितीय संस्कार युक्त मध्यम ग्रह है । दूसरे संस्कार युक्त मध्यम ग्रह को मन्दोच्च में से फिर घटावे और शेष को दूसरा मन्द केन्द्र मान कर दूसरा मंद फल बनावे। इस मंद फल को मध्यम ग्रह में जोड़ने या घटाने से जो आता है वही मन्द स्पष्ट ग्रह कहलाता है । मन्द स्पष्ट ग्रह को शीघ्रोच्च में से घटाकर शीघ्र केन्द्र और शीघ्रफल बनावे और इस शीघ्रफल को मन्द स्पष्ट ग्रह में जोड़ने या घटाने से जो कुछ आवे वही स्पष्ट ग्रह कहलाता है । विज्ञान भाष्य—इस नियम को बीज-गणित की रीति से यों लिख सकते हैं :— शीघ्रोच्च—मध्यम-ग्रह=शीघ्र केन्द्र, जिसका शीघ्रफल पहला शीघ्रफल कहलाता है । पहला संस्कार युक्त मध्यम ग्रह =मध्यम ग्रह ± शीघ्रफल (पहला) / २ मन्दोच्च — पहला संस्कार युक्त मध्यम ग्रह = संस्कृत मन्द केन्द्र जिसका मन्द- फल प्रथम संस्कृत मन्दफल है । दूसरा संस्कार युक्त मध्यम ग्रह =पहला संस्कार युक्त मध्यम ग्रह ± मन्दफल (प्रथम संस्कृत) / २ =मध्यम ग्रह ± (पहला) शीघ्रफल / २ ± (पहला) मन्दफल / २ मन्दोच्च — दूसरा संस्कारयुक्त मध्यम ग्रह = दूसरा संस्कृत मन्द केन्द्र जिसका मन्दफल दूसरा संस्कृत मन्दफल है ।