सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)

सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)
Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary
भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा
DevanagariHindipublished838 पृष्ठ
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स्पष्टाधिकार १४१ सामा जिस धनु (कोण) की ज्या है वही शीघ्रफल कहलाता है । ४२वें श्लोक के उत्तरार्द्ध में यह बतलाया गया है कि शीघ्रफल की आवश्यकता केवल मंगल, बुध, गुरु, शुक्र और शनि पांच ग्रहों के स्पष्ट स्थान जानने के लिए पड़ती है, सूर्य और चन्द्रमा के लिए नहीं। सूर्य और चन्द्रमा के स्पष्ट स्थान तो केवल मंद फल के संस्कार से आ जाते हैं जैसा कि अगले (४३वें) श्लोक में बतलाया गया है। यदि ३६-४१ श्लोकों को बीजगणित के अनुसार एक ही समीकरण से प्रकट करना चाहें तो उसका रूप यह होगा :— चलकर्ण = { ( ३४३८ ± शीघ्र स्फुट परिधि x कोटि ज्या / २१६०० )²
- ( शीघ्र स्फुट परिधि x भुजज्या / २१६०० )² }^(१/२) इसमें शीघ्र केन्द्र की ज्या और कोटि ज्या भारतीय रीति से निकाल कर उपर्युक्त ग्रह के 'भुज ज्या' और 'कोटि ज्या' के लिए लिखना चाहिये । शीघ्र स्फुट परिधि ३८वें श्लोक के अनुसार जानना चाहिये और इसे कलाओं में लिखना चाहिये । मान्दं कर्मैकमर्केन्दोर्भौमादीनामथोच्यते । शैघ्रं मान्दं पुनर्मान्दं शैघ्रं चत्वार्यनुक्रमात् ।।४३।। अनुवाद—(४३) सूर्य और चन्द्रमा मन्द फल के केवल एक संस्कार से स्पष्ट होते हैं; परन्तु मंगल आदि पांच ग्रहों में शीघ्र फल का एक संस्कार करने के पीछे मंद फल के दो बार संस्कार करने पड़ते हैं जिसके पीछे चौथी बार फिर शीघ्र फल का संस्कार करना होता है । विज्ञान भाष्य—हमारे प्राचीन आचार्यों ने चंद्रमा का स्पष्ट स्थान जानने के लिए केवल मंद फल का संस्कार करने की रीति बतायी है । परन्तु इससे वास्तव में चन्द्रमा का स्पष्ट स्थान नहीं निकलता। चन्द्रमा इतना छोटा पिंड है कि इस पर सभी ग्रहों का प्रभाव पड़ता है, जिसके कारण इसकी गति में बहुत सी भिन्नताएं उत्पन्न हो जाती हैं। इसलिए आजकल छोटे-छोटे कोई ४० संस्कार करने से चन्द्रमा का स्पष्ट स्थान शुद्धतापूर्वक जाना जा सकता है। इन चालीस संस्कारों में पाँच संस्कार बहुत बड़े हैं जो अवश्य करने चाहियें । इनकी चर्चा संक्षेप में आगे उस स्थान पर की जायगी जहां आजकल की पद्धति से ग्रहों के स्पष्ट स्थान जानने की रीति बतलायी जायगी । मंगल आदि पांच ग्रहों के स्पष्ट स्थान जानने के लिए जिन चार संस्कारों की चर्चा इस श्लोक में है उनकी रीति अगले ४४वें श्लोक में बतलायी गयी है।