सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)

सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)
Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary
भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा
DevanagariHindipublished838 पृष्ठ
पृष्ठ 163, कुल 838 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 163
१४० सूर्य सिद्धान्त गाप = √(भाप)² + (गाभा)² = √(भामा + माप)² + (गा भा)² = √(कोटिफल + त्रिज्या)² + (भुजफल)² इसी तरह गैप = √(भैमै + मैप)² + (गैभै)² = √(कोटिफल + त्रिज्या)² + (भुजफल)² परन्तु गीप = √(भीप)² + (गी भी)² = √(मीप - मी भी)² + (गी भी)² = √(त्रिज्या - कोटिफल)² + (भुजफल)² और गूप = √(मूप - मू भू)² + (गू भू)² = √(त्रिज्या - कोटिफल)² + (भुजफल)² इस प्रकार यह प्रकट है कि यदि शीघ्र केन्द्र पहले और चौथे पदों में अर्थात् ३ राशि के भीतर और ६ राशि के ऊपर हो तो त्रिज्या में कोटिफल को जोड़ना चाहिये परन्तु यदि शीघ्र केन्द्र दूसरे और तीसरे पदों में अर्थात् ३ राशि से ऊपर और ६ राशि के भीतर हो तो त्रिज्या में कोटिफल को घटाना चाहिये, फिर जो कुछ आवे उसके वर्ग को भुजफल के वर्ग में जोड़कर वर्गमूल निकालना चाहिये तो चलकर्ण ज्ञात हो जायगा। इन चारों समीकरणों को एक समीकरण में यों लिखा जा सकता है :-- चलकर्ण = √(त्रिज्या ± कोटिफल)² + (भुजफल)² इसमें धनात्मक चिह्न तब प्रयोग करना चाहिये जब शीघ्र केन्द्र पहले और चौथे पदों में हो और ऋणात्मक चिह्न उस समय प्रयोग करना चाहिये जब शीघ्र केन्द्र दूसरे और तीसरे पदों में हो। कर्क चौथी राशि है और मकर १०वीं, इसलिए 'कर्कादौ' का अर्थ है चौथी राशि से ६वीं राशि और 'मकरादौ' का अर्थ है १०वीं राशि से ३री राशि तक। मकरादि और कर्कादि शब्दों से यह भ्रम हो सकता है कि जब ग्रह इन राशियों में हो तो उपर्युक्त धन या ऋण चिह्न प्रयोग करना चाहिये। इसलिए मैंने अनुवाद में राशि की जगह पदों का व्यवहार किया है जो मेरी समझ में अधिक स्पष्ट है। जब चलकर्ण ज्ञात हो गया तब शीघ्रफल जानने के लिए ३६वें श्लोक के समीकरण (३) का रूप यह होगा :-- सामा = त्रिज्या × शीघ्र भुजफल
चलकर्ण