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सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)

सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)

Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary

भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा

DevanagariHindipublished838 पृष्ठ

पृष्ठ 162, कुल 838 में से

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स्पष्टाधिकार १३६ को मन्द फल मान लिया गया है और समीकरण (३) की आवश्यकता नहीं बतलायी गयी है, इसका कारण यह है कि किसी ग्रह की मन्द परिधि का मान इतना कम होता है कि मन्द कर्ण गाप और त्रिज्या सा प में बहुत कम अन्तर होता है जिसके कारण स्थूल रूप से भुजफल के धनु को ही मन्द फल मान लिया गया है । यदि सूक्ष्म गणना करना चाहें तो समीकरण (३) में जो कुछ बतलाया गया है वह संस्कार भी करना होगा; जैसा कि अगले ४०-४२ श्लोकों में शीघ्रफल के लिए नियम है; क्योंकि शीघ्र परिधि के बड़े होने से शीघ्र कर्ण और त्रिज्या का अन्तर बहुत अधिक होता है; जिससे शीघ्र भुजफल और शीघ्रफल के मानों में बहुत अन्तर होता है । इसलिए ३६वें श्लोक के अनुसार शीघ्र भुजफल को ही शीघ्रफल मान लेने में बहुत अशुद्धि रह जाती है । शैघ्रं कोटिफलं केन्द्रे मकरादौ धनं स्मृतम् । संशोध्यं तु त्रिजीबातः कर्क्यादौ कोटिजं फलम् ।।४०।। तद्बाहुफलवर्गैक्यान्मूलं कर्णश्चलाभिधः । त्रिज्याऽभ्यस्तं भुजफलं चलकर्णविभाजितम् ।।४१।। लब्धस्य चापं लिप्तादिफलं शैघ्रामिदं स्मृतम् । एतदादौ कुजादीनां चतुर्थे चैव कर्मणि ।।४२।। अनुवाद-(४०) यदि शीघ्र केन्द्र ६ राशि (२७०°) के ऊपर और ३ राशि (६०°) के भीतर हो तो कोटि फल को त्रिज्या में जोड़े, परन्तु यदि शीघ्र केन्द्र ३ राशि के ऊपर और ६ राशि के भीतर हो तो कोटिफल को त्रिज्या में से घटावे; (४१) जो कुछ आवे उसका वर्ग करके भुजफल के वर्ग में जोड़ दे और योगफल का वर्गमूल निकाले, जो आवे वही शीघ्रकर्ण या चलकर्ण होता है । त्रिज्या को भुजफल से गुणा करके चलकर्ण से भाग दे दे, (४२) लब्धि जिस धनु (कोण) की ज्या होगी वही शीघ्रफल कहलाता है। यह शीघ्रफल मंगल आदि पांच ग्रहों के पहले और चौथे संस्कार के लिए काम में आता है । विज्ञान भाष्य- ३६वें श्लोक के विज्ञान भाष्य के अन्त में जिस समीकरण (३) की चर्चा है वह शीघ्रफल जानने के लिए बड़ा आवश्यक है । शीघ्रफल के लिए इस समीकरण का रूप यह होगा :- $सामा = \frac{त्रिज्या \times भुजफल}{शीघ्रकर्ण}$ इसमें जो भुजफल आया है वह तो ३६वें श्लोक से ही जाना जा सकता है, त्रिज्या का मान पहले से नियत है, केवल शीघ्रकर्ण का मान जानना रह गया जिसका नियम ४०वें और ४१वें श्लोक के पूर्वार्द्ध में बतलाया गया है । चित्र ३१ से प्रकट है कि गाप, गीप, गूप और गैप चलकर्ण है । इनमें से

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