सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)
Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary
भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंस्पष्टाधिकार १४६ इसी भुजफल को मन्दफल मान लिया जाता है। यदि और सूक्ष्म गणना करनी हो तो ४०-४२ श्लोकों की क्रिया भी करनी चाहिये जैसा कि ३६वें श्लोक के विज्ञान भाष्य के समीकरण (३) में दिखलाया गया है। परन्तु ऐसा करने में गणित बहुत करना पड़ता है और अन्तर बहुत कम होता है, इसलिए मन्द फल के लिए ४०-४२ श्लोकों की क्रिया करने की आवश्यकता नहीं है। यही मन्द फल सूर्य के मध्यम स्थान में जोड़ना चाहिये क्योंकि मंद केन्द्र पहले दो पदों में है, जैसा कि ५वें और आगे आने वाले ४५वें श्लोकों में बतलाया गया है। इसलिए सूर्य का स्पष्ट स्थान उज्जैन में वसंत पंचमी की मध्यम अर्द्धरात्रि को ६^(रा) ८° १२' ६'' + ४७' अर्थात् ६^(रा) ८° ५६' ६'' होगा । गुरु का स्पष्ट स्थान जानने के लिए- गुरु का मन्द केन्द्र = गुरु का मन्दोच्च - गुरु का मध्यम स्थान = ५^(रा) २१° २४' ३६'' - ६^(रा) १६° ५२' ३७' = ११^(रा) १° ३०' स्वल्पान्तर से गुरु का शीघ्र केन्द्र = गुरु का शीघ्रोच्च - गुरु का मध्यम स्थान = सूर्य का मध्यम स्थान - गुरु का मध्यम स्थान = ६^(रा) ८° १२' ६'' - ६^(रा) १६° ५२' ३७'' = २^(रा) १८° १६' ३२'' = २^(रा) १८° २०' स्वल्पान्तर से = ७८° २०' शीघ्र केन्द्र ३ राशि से कम है इसलिए विषम पद में है; इसलिए ७८° २०' की ज्या शीघ्र भुजज्या और ११° ४०' की ज्या शीघ्र कोटिज्या हुई । ७८° २०' = ७८ × ६० + २० कला = ४७०० कला ४७०० / २२५ = २० पिंड + २०० कला २० वें पिंड की ज्या = ३३२१' २१ वें पिंड की ज्या = ३३७२' दोनों की ज्याओं का अन्तर = ५१' २२५ : २०० : : ५१ : अभीष्ट अन्तर