भारतकोश
सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)

सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)

Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary

भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा

DevanagariHindipublished838 पृष्ठ

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१४८ सूर्य-सिद्धान्त मन्द केन्द्र ३ राशि से अधिक और ६ राशि से कम है इसलिए दूसरे पद में है और गत भाग ६६°५' ५२" तथा गम्य भाग (६०° में से गत भाग घटाने पर) २०°५४' ३८" है। इसलिए ३० वें श्लोक के अनुसार गम्य' की ज्या अर्थात् २०°५४' ३८" की ज्या भुजज्या होगी और ६६°५' २२" की ज्या कोटि ज्या होगी । २०°५४' ३८" = २०°५५' स्वल्पान्तर से = २० × ६० + ५५ कला = १२५५' ३१वें श्लोक के अनुसार १२५५' को २२५ से भाग देने पर गत पिंड ५ और ६ठें पिंड में १३०' आया । ५वें पिंड की ज्या = ११०५' ६ठें " " = १३१५' दोनों ज्याओं का अन्तर २१०' अब २२५ : १३०' : : २१० : अभीष्ट ∴ अभीष्ट ज्या का अन्तर = (१३० × २१०) / २२५ = ३६४ / ३ = १२१' इसलिए ३२वें श्लोक के अनुसार जब १२१' को ५वें पिंड की ज्या अर्थात् ११०५' में जोड़ा तो आया १२२६' ; यही इष्ट भुजज्या है.। ३४वें श्लोक के अनुसार सूर्य की मन्द परिधि समपद के अन्त में १४° और विषम पद के अन्त में २०' कम होती है, इसलिए जब भुजज्या १२२६' होगी तब ३८वें श्लोक के अनुसार मंद परिधि (२०' × १२२६') / ३४३८' अर्थात् स्वल्पान्तर से ७' कम होगी, ∴ स्फुट मन्द परिधि = १४° - ७ = १४ × ६० - ७ कला = ८३३' इसलिए ३६वें श्लोक के अनुसार, भुजफल = (८३३ × १२२६) / २१६०० कला = १०२१२५८ / २१६०० = ४७' स्वल्पान्तर से