भारतकोश
सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)

सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)

Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary

भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा

DevanagariHindipublished838 पृष्ठ

पृष्ठ 170, कुल 838 में से

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स्पष्टाधिकार १४७ इन ग्रहों के मध्यम स्थान जानने के लिए कलियुग के आदि से अहर्गण निकाल कर गणना करनी चाहिये, जैसा कि मध्यमाधिकार के ५६वें श्लोक में बतलाया गया है । कलियुग के आदि से १८७६ वि० की वसंत पंचमी की अर्द्ध रात्रि तक के अहर्गण (मध्यमाधिकार के अनुसार निकाला तो) १८,३४,६७७ हुए । जब एक महायुगीय सावन दिन में अर्थात् १५७,७६,१७,८२८ सावन दिन में सूर्य के ४३,२०,००० भगण होते हैं तब १८,३४,६७७ सावन दिन में भगण १८,३४,६७७ × ४३२ × १०⁴ = ————————————————————— १५७७६१७८२८ = ५०२३ भ ६रा ८° १२′ ६″ ∴ सूर्य का मध्यम स्थान = ६रा ८° १२′ ६″ इसी तरह गुरु का मध्यम स्थान १८३४६७७ × ३६४२२० = —————————————————— १५७७६१७८२८ = ४२३ भ ६रा १५° ५२′ ३७″ = ६रा १५° ५२′ ३७″ और बुध के शीघ्रोच्च का स्थान १८,३४,६७७ × १,७६,३७,०६० = ————————————————————————— १,५७,७६,१७,८२८ = २०८५६ भ २रा ६° २६′ १७″ = २रा ६° २६′ १७″ अब पहले सूर्य का स्पष्ट स्थान जानना चाहिये :—इस अध्याय के श्लोक २६ के अनुसार, सूर्य का मन्द केन्द्र = सूर्य के मन्दोच्च का स्थान — सूर्य का मध्यम स्थान = २रा १७° १७′ ३१″ — ६रा ८° १२′ ६″ = ५रा ६° ५′ २२″ = १५६° ५′ २२″ यहाँ २ राशि ६ राशि से कम है इसलिए २ में १२ राशि (१ भगण) जोड़कर योगफल में से ६ राशि घटायी गयी है । ऐसी ही क्रिया जहां कहीं आवश्यकता पड़े करनी चाहिये ।

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